Saturday, January 23, 2010

मोटी नहीं, स्वस्थ बनें महिलाएं


वजन कम करने और 'साइज जीरो' बॉडी पाने का शगल इन दिनों चारों ओर जोर पकड़े हुए है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह शगल महिलाओं को बीमारियों की ओर धकेलने के अलावा कुछ नहीं कर रहा। महिलाओं को इसके बजाए संतुलित भोजन पर ध्यान देना चाहिए, जो भविष्य के लिए उनके शरीर को भीतर से मजबूत करे। फिजीशियन डॉ. कल्पना जैन ने बताया कि लड़कियों में वजन कम करने के लिए दवाइयां लेने का चलन उनके पूरे अंदरुनी चक्र को प्रभावित कर रहा है। डॉ. कल्पना ने कहा कि घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियां निभाने के बाद डायटिंग का जोर महिलाओं की पूरी शारीरिक संरचना को प्रभावित करता है। महिलाएं भरपेट और संतुलित भोजन करें, इससे न तो वजन बढ़ेगा और न ही शरीर को बीमारियां कभी घेरेंगी। बाजार में मिल रही वजन कम करने की दवाइयों के दुष्प्रभावों के बारे में उन्होंने कहा कि बाजार में बहुत सी ऐसी रसायनयुक्त दवाइयां मिलती हैं, जो कुछ ही सप्ताह में वजन कम करने का दावा करती हैं। ऐसी दवाएं खास तौर पर महिलाओं को बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इनमें मौजूद रसायन उनके प्रजनन चक्र को प्रभावित करते हैं। ब्रिटेन के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भी लगातार वजन घटाने की कोशिश के दुष्परिणाम अपने शोध में प्रदर्शित किए हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि हड्डियों की मजबूती सीधे तौर पर वसा के स्तर से जुड़ी है। इसका मतलब है कि पतले होने और कम वजन का दबाव हड्डियों के टूटने के खतरे को बढ़ा सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक महिलाओं में हड्डियों का मजबूत होना ज्यादा जरूरी है क्योंकि महिलाओं में हड्डियों के पतले होने या ओस्टियोपोरोसिस के अलावा कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा भी पुरुषों से तीन गुना ज्यादा होता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मानसी भोगल ने बताया कि महिलाएं अगर वजन कम करने के बजाए स्वस्थ होने की ओर ध्यान दें, तो शरीर की सभी समस्याएं स्वत: ही सुलझ जाएं। डॉ. मानसी ने कहा कि वजन कम करने के लिए डायटिंग का सहारा लेना शरीर को हमेशा के लिए खराब करना है। आज-कल लड़कियां कम वजन के लिए खाना कम कर देती हैं, जो उनके आगे के पूरे जीवनचक्र को खराब करता है। डॉ. मानसी के अनुसार, किशोर लड़कियां और युवतियां यह नहीं समझ पातीं कि उन्हें भविष्य में मां बनने के लिए अपने शरीर को अभी से फिट रखना जरूरी है। गर्भावस्था और मां बनने के दौरान शरीर को अंदरुनी ताकत की जरूरत होती है, जो डायटिंग से नहीं मिल सकती। डॉ. मानसी ने जोर देते हुए कहा कि महिलाओं को मोटापे से दूर रहना चाहिए, लेकिन वजन कम करने और पतले होने की 'अनावश्यक सनक' बीमारियों के अलावा कुछ नहीं दे सकती।

Thursday, January 21, 2010

सही ढंग से कही बात, सही निशाने पर करती है वार


बात सिर्फ बोलने की नहीं होती। बोलते तो सभी हैं, लेकिन किसी के बोलने की कला उसे दूसरों के दिलों में खास जगह दिला सकती है, तो किसी की बिना बात की बकबक किसी के पल्ले नहीं पड़ती। मार्टिन लूथर किंग, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और बराक ओबामा ने अपनी वाक्पटुता से ही इतिहास का रूख मोड़ दिया। राजधानी में वाद-विवाद की कई स्पर्धाओं में भाग ले चुके रजत शाह बताते हैं कि बोलने की शैली बहुत मायने रखती है। अगर आप तथ्यों से परिचित हैं, लेकिन अपनी बात आपने सही तरीके से पेश नहीं कर पाते तो आपकी जानकारी निरर्थक साबित हो सकती है। आपको अपनी बात सही तरीके से रखना आना चाहिए। वे कहते हैं कि साक्षात्कार हो या साधारण वाद-विवाद की स्पर्धा, किसी भी बात के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष को प्रभावशाली तरीके से पेश करने पर जीत तय होती है। बोलते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपने विषय से भटकें नहीं। पश्चिमी देशों में 22 जनवरी को 'स्पीच एंड सक्सीड डे' के रूप में मनाया जाता है। हालांकि इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, इस बारे में आधिकारिक तथ्य नहीं मिलते। अधिवक्ता ए के उपाध्याय कहते हैं कि हमारे पेशे में बोलने की शैली बहुत महत्व रखती है। हमारा प्रतिद्वंद्वी हमारे सामने दलील पेश करता है और हमें अपने मुवक्किल की खातिर उसकी दलीलों को प्रभावशाली तरीके से काटना पड़ता है। उपाध्याय ने कहा कि बहस लंबी चलती है और इसमें हमें पूरा ध्यान विषय पर ही केंद्रित रखना होता है। हार जीत हमारे लिए महत्व नहीं रखती। मुवक्किल के लिए प्रतिबद्धता हमें अपनी वाक्कला से ही साबित करनी होती है। शाह उदाहरण देते हैं कि मार्टिन लूथर ने अपने भाषणों से अमेरिका में नई क्रांति का सूत्रपात किया था। महात्मा गांधी के भाषणों के ओज ने सदियों से गुलामी की बेडि़यों में जकडे़ भारत के लोगों में स्वाधीनता पाने का जोश भरा। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषणों ने लोगों को प्रेरित किया कि उन्हें हर हाल में आजादी हासिल करना है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का 14 अगस्त 1947 की रात को रेडियो पर दिया गया भाषण ट्रिस्ट विद डेस्टिनी इतिहास के सर्वश्रेष्ठ भाषणों में गिना जाता है। उस भाषण में स्वतंत्र भारत के सामने खड़ी चुनौतियों के बेहद संजीदा जिक्र जैसी मिसाल मिलना बहुत मुश्किल है। शाह के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई वाक्कला में महारथ रखते हैं। मेगास्टार अमिताभच्बच्चन की बोलने की शैली लाजवाब है। उपाध्याय कहते हैं कि स्कूल कालेज में भी वही प्राध्यापक अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो पाते हैं जो अपनी बात विद्यार्थियों कोच्अच्छी तरह समझा सकते हैं। समझाने के पीछे वाक्कला की ही भूमिका होती है। वे कहते हैं कि भाषण शैली व्यक्तित्व, समर्पण और त्याग के सिद्धांतों पर चलने से निखरती है। उपाध्याय ने अमेरिका के इतिहास में नया अध्याय जोड़ने के प्रेरक बने ओबामा के सिर्फ तीन शब्दों 'यस, वी कैन' का जिक्र करते हुए कहा कि ओबामा के इन तीन अल्फाज ने अमेरिकी जनता को मोह लिया और नया इतिहास लिखने का जज्बा और ताकत दी।

Sunday, February 15, 2009

बोझिल होती शादीशुदा जिंदगी में कारगर सेकेंड हनीमून


'उस दौर से शुरू करें फिर-ए-जिंदगी, हर शह जहां हसीन थी हम तुम थे अजनबी...' कुछ इसी तरह 'सेकेंड हनीमून डे' जैसे अवसर बोझिल होती शादीशुदा जिंदगी में रवानगी डालने के लिए कारगर हो सकता है। पश्चिम में 'सेकेंड हनीमून' मनाने का प्रचलन है। इसी आधार पर इसका प्रचलन कब से शुरू हुआ, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

हालांकि इस तरह के छोटे-मोटे अवसर रिश्तों को न केवल तरोताजा कर देते हैं बल्कि उनमें नई ऊर्जा का संचार भी करने में सक्षम होते हैं। वरिष्ठ मनोचिकित्सक एस। सुदर्शन के अनुसार बीते कुछ समय में तेज रफ्तार जिंदगी के साथ ही खास कर नवविवाहित महिलाओं के मनोरोग की चपेट में आने की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है। इसके पीछे वह तर्क देते हैं कि भाग-दौड़ भरी शहरी जिंदगी में नवविवाहित जोड़ों के पास एक-दूसरे के लिए काफी कम समय रहता है और अकसर दोनों के कामकाजी होने के कारण दोनों काफी कम वक्त साथ गुजारते हैं।

उन्होंने कहा कि वैवाहिक जिंदगी को लेकर लड़की कुछ सपने संजोए रहती है और जब उसकी ख्वाहिशें पूरी नहीं हो पाती हैं तो वह डिप्रेशन का शिकार हो जाती है। इससे बचने के बारे में मनौवैज्ञानिकों का मानना है कि शहरी जिंदगी के बीच पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे के लिए फिक्रमंद रहना चाहिए और समय निकालना चाहिए। इससे आपसी प्रेम बढ़ेगा और शादीशुदा जिंदगी की समस्याएं दूर होंगी।डा. सुदर्शन के मुताबिक सेकेंड हनीमून जैसी सोच बेहतर होती है, क्योंकि पहले हनीमून के वक्त युगल एक दूसरे की अपेक्षाओं से अनजान रहते हैं, जबकि दूसरे हनीमून के समय एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ चुके होते हैं ।

डाट काम के मैरिज गाइड शैरी स्ट्रीट्फ का कहना है कि हमने छह दफा हनीमून मनाया। हम जहां गए वहां की यादें हमारे लिए पहली दफा से अधिक महत्वपूर्ण रही। हकीकत यह है कि जब भी हम एक दूसरे के लिए वक्त निकालते हैं,वह अहम होता है।

पहले हनीमून के बजाय दूसरा हनीमून ज्यादा अहम होता है क्योंकि पहले हनीमून के वक्त अमूमन दोनों एक दूसरे से अंजान होते हैं और एक दूसरे की सोच को लेकर जेहन में तस्वीर साफ नहीं होती है। लेकिन दूसरे हनीमून के मौके पर दोनों न केवल एक दूसरे को समझ लेते हैं बल्कि दोनों का प्रेम एक नया आयाम ले चुका होता है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हर दिन व्यक्ति अपना और अपने परिवार का कई तरीकों से ख्याल रखता है। लेकिन क्या वह अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते का ध्यान रख पाता है। उनका मानना है कि व्यक्ति चाहे पति हो या पत्नी व्यस्त जिंदगी और जिम्मेदारियों के कारण एक दूसरे की भावनाओं का दमन करता रहता है। रोज-ब-रोज की जिंदगी की जिम्मेदारियों से दूर सेकेंड हनीमून दोनों का एक साथ गुजारा गया यादगार वक्त साबित हो सकता है।

Sunday, January 18, 2009

लड़की ने रचाई मेंढक से शादी


दुनियां में कैसी-कैसी घटनाएं होती रहती है और लोग कैसे अंधविश्वासी होते हैं इसका ताजा उदाहरण हमें देखने को मिल रहा है, तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में पुडुचेरी सीमा पर स्थित पल्लुपुथूपट्टु गांव में एक आठ वर्षीय लड़की ने मेंढक से शादी रचा ली है। सुनने में यह घटना भले ही अजीब लगती हो। लेकिन सच है। यहां हर साल पूरे रीति-रिवाज के साथ इस तरह की शादी का आयोजन होता है।

मान्यता है कि इससे गांव वाले बीमारियों से मुक्त हो जाते हैं और साल भर बुरी शक्तियों के प्रभाव से बचे रहते हैं। इस साल आर विज्ञानेश्वरी नाम की लड़की से मेंढक की शादी हुई है। परंपरा के अनुसार तमिल महीने के पहले दिन विवाह का मुहूर्त निकलता है। बीते शुक्रवार को भी ऐसा ही मुहूर्त था।

इस दिन गांव के मुथुमेरियम्मन मंदिर के तालाब से मेंढक निकाला गया और विज्ञानेश्वरी से उसकी शादी कर दी गई।मंदिर के पश्चिम क्षेत्र में रहने वाले लोग मेंढक की तरफ से विज्ञानेश्वरी के घर गए और उसकी शादी के लिए उसके माता-पिता से अनुमति ली। इसके बाद भजन और ढोल नगाड़ों के शोर के बीच मंदिर के पुजारी ने लड़की और मेंढक की शादी करा दी।

Monday, January 5, 2009

सच्चा प्यार हमेंशा के लिए


यूं तो सच्चा प्यार होना ही मुश्किल है। लेकिन यदि एक बार हो जाए तो यह वर्षो तक खुशी और ऊर्जा प्रदान करता है। कवियों और साहित्यकारों के इन दावों की पुष्टि अब वैज्ञानिकों ने भी कर दी है।

ब्रिटेन में हाल में हुए शोध में दावा किया गया है कि सच्चा प्यार हमेशा के लिए होता है। इस संबंध में अभी तक हुए अध्ययन में कहा गया था कि प्यार का भूत 15 महीनों के भीतर उतर जाता है। जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है प्यार की तीव्रता भी घटती जाती है।स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि सच्चे प्रेम में डूबे लोग ताउम्र प्यार को लेकर उतना ही उत्साहित रहते हैं जितना शुरू में थे। शीर्ष वैज्ञानिक अर्थर अरन ने बताया कि उनकी खोज रोमांस की उस पारंपरिक धारणा के विरुद्ध जिसमें दावा किया गया है कि एक दशक बीतते-बीतते प्यार फीका पड़ जाता है।

सच्चे प्यार में डूबे लोगों के साथ ऐसा नहीं होता।अध्ययन के दौरान 20 साल पुराने प्रेमियों और हाल ही में प्रेम में पड़े जोड़ों को शामिल किया गया। उन्हें उनके प्रेमी की फोटो दिखाई गई और उनके दिमाग की स्कैनिंग की गई। तुलनात्मक अध्ययन से पता चला कि हर दस में एक पुराने जोड़े के दिमाग में वहीं रसायनिक प्रतिक्रिया हो रही थी जो हाल ही में प्यार में पड़े लोगों में होती है।

Friday, December 19, 2008

पुरुषों से ज्यादा साथी रखती हैं युवतियां


ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में पता चला है कि पुरुषों की तुलना में युवतियां अधिक लोगों से शारीरिक संबंध बनाती हैं।शोधकर्ताओं ने अध्ययन के बाद कहा है कि इस मामले में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक स्वच्छंद होती हैं और औसतन 21 साल आयु की युवतियां नौ पुरुषों से संबंध रखती है, वहीं युवक केवल सात महिलाओं से।हालांकि यह सर्वेक्षण केवल दो हजार लोगों से बातचीत के आधार पर किया गया है।

डेली टेलीग्राफ की खबर के अनुसार सर्वेक्षण से नतीजा निकाला गया है कि युवतियां दो बार धोखा दे सकती हैं और 70 प्रतिशत से अधिक युवतियां केवल एक रात के संबंध बनाती हैं।

सर्वेक्षण के अनुसार चार में से एक युवती दस से अधिक लोगों के साथ संबंध बना चुकी होती है जबकि पुरुषों में केवल पांच में से एक ऐसा करता है।

इस सर्वेक्षण का एक रोचक पहलू यह भी है कि यौन मामलों को लेकर केवल कुछ ही महिलाएं आज भी परंपरागत नजरिया रखती हैं। केवल एक प्रतिशत युवतियों ने कहा कि वे शादी के बाद ही यौन संबंध बनाने में यकीन रखती हैं। साथ ही अधिकतर युवतियां केवल 16 साल की उम्र में कौमार्य खो देती हैं।

Monday, December 1, 2008

सरकारी डोली चढ़ दुल्हनें चलीं पिया घर


सरकार और प्रशासन का यह संवेदनशील चेहरा है। वहीं आमलोगों की सदाशयता और परमार्थ करने के भाव का प्रकटीकरण भी। जिला प्रशासन ने उत्तर रक्षा गृह की एक दर्जन युवतियों को सरकारी डोली पर बिठा पिया के घर भेजा। नई जिंदगी की शुरूआत करने के लिए आवश्यक सामान भी प्रदान किए गए।

रविवार को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में वैदिक मंत्रोच्चार, मंगल गीतों एवं बैंड बाजे की धुन के बीच शहीद खुदीराम बोस स्टेडियम में प्रशासन की ओर से विवाह मंडप सजा। मंडप में उत्तर रक्षा गृह की एक दर्जन लड़कियों के जीवन की डोर बंधी। मौके पर आशीर्वाद देने शहर उमड़ पड़ा। उपहारों की बौछार हो गई। हर जोड़े को अपनी गृहस्थी बसाने को लगभग हर जरूरी सामान उपलब्ध हो गया।

डीएम विपिन कुमार, डीएसपी नगर निर्मला कुमारी तो पहुंची हीं, समाज कल्याण विभाग के राज्य बाल संरक्षण इकाई के उप निदेशक रविनंदन सहाय एवं सहायक उप निदेशक अनीता कुमारी कार्यक्रम समापन तक मौजूद रहे।इस अनूठे वैवाहिक कार्यक्रम के बाद सभी जोड़ों ने बाबा गरीबनाथ मंदिर में पूजा अर्चना की और फिर सरकारी डोली से ससुराल गई।