Wednesday, February 3, 2010

कहां गुम हो गया खाकी वर्दी में सजा डाकिया!


अब खाकी वर्दी में सजा डाकिया नजर नहीं आता और अगर भूले भटके दिख भी जाए तो पहले जैसी खुशी नहीं होती, क्योंकि सूचना क्रांति के इस दौर में कागज की चिट्ठी पत्री को फोन, एसएमएस और ई ़ मेल संदेशों ने कोसों पीछे छोड़ दिया है।
कुछ देशों में चार फरवरी को ''थैंक्स अ मेलपर्सन डे'' मनाया जाता है, लेकिन जिस तेजी से अत्याधुनिक संचार सेवा का प्रसार हो रहा है उससे लगता है कि बहुत जल्द ही डाक और डाकिया केवल कागजों में सिमटे रह जाएंगे।
समाज शास्त्री प्रो के के मलिक कहते हैं कि एक समय था जब हर घर को डाकिया कहलाने वाले मेहमान का बेसब्री से इंतजार होता था और दरवाजे पर उसके कदमों की आहट घर के लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट ला देती थी। लेकिन आज सूचना क्रांति के इस दौर में यह डाकिया 'लुप्त' होता जा रहा है। अब तो डाकिया नजर ही नहीं आता, जबकि पहले उसकी आहट से लोग काम छोड़ कर दौड़ पड़ते थे।
सूचना क्रांति के इस दौर में घटते महत्व का अहसास डाकियों को भी है। राजधानी के पालम इलाके के एक पोस्टमैन अम्मल मैनी कहते हैं कि अब जो डाक आ जाती है, वह बांट देते हैं। पहले की तरह अधिक डाक अब नहीं आती। अब तो घरों के सामने डिब्बे लगे रहते हैं, उनमें ही डाक डाल दी जाती है। इनाम तो अब सपना हो गया है।
उम्र के 81वें पड़ाव पर पहुंच चुकी निन्ना बक्शी कहती हैं कि डाकिया मेरे लिए खास महत्व रखता था। मेरा परिवार भोपाल रियासत में रहता था और मेरे पिता रियासत में ही एक कारिंदे थे। मेरी शादी ग्वालियर में हुई। पति वायुसेना में एयरमैन थे इसलिए जगह-जगह तबादला होता रहा। अपने माता पिता का हालचाल जानने का एकमात्र माध्यम मेरे लिए चिट्ठी होती थी। मैं तो कभी स्कूल नहीं गई, लेकिन मेरे पति ने मुझे पढ़ना सिखाया था। मैं अपने माता-पिता को चिट्ठियां लिखती थी।
निन्ना कहती हैं कि उनकी खैरियत जानने का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता था। बाद में जब मेरे बच्चे पढ़ने लगे तो मुझे कुछ साल पंजाब के फिरोजपुर में रहना पड़ा और मेरे पति की पोस्टिंग असम के छबुआ में थी। वह भी चिट्ठी लिखते थे। डाकिया आता था तो मैं खुशी से फूली नहीं समाती थी। त्योहारों पर हम डाकिए को इनाम भी देते थे।
कुब्बा सिंह ने देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में कराची के पास स्थित झांग गांव से भारत आकर राजधानी दिल्ली में ऑटो पा‌र्ट्स की दुकान खोली थी। उनके माता पिता और अन्य संबंधी पाकिस्तान में ही रहे।
वे कहते हैं कि चिट्ठी से ही हम एक-दूसरे का हाल जानते थे। मैं तो डाकिए के आने पर चिट्ठी पाकर इतना खुश हो जाता था कि उसे चाय भी पिलाता था।
कुब्बा सिंह कहते हैं कि अगर डाकिया तार ले कर आता था तो लोग घबरा जाते थे। लगता था कि जरूर कोई अशुभ सूचना ही होगी वरना तार नहीं आता। अच्छी खबर तार से कम ही आती थी। अगर तार में अच्छी खबर है तो डाकिए को इनाम देना तय रहता था।
सिंह कहते हैं कि अब मेरा बेटा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है और देश के विभिन्न हिस्सों में तथा कई बार भारत से बाहर भी जाता है, लेकिन वह हमें चिट्ठी लिखने के बजाय फोन पर बात करता है। फोन ही अब डाकिया बन गया है। मैनी कहते हैं कि अब चिट्ठियां कम हो गई हैं। डाक से आने वाली सामग्री में सरकारी कार्यालयों की डाक, पत्रिकाएं, अखबार आदि होते हैं। वैसे भी, लोग कूरियर कंपनियों से पार्सल भेजना पसंद करते हैं। रक्षाबंधन जैसे पर्व पर हमारी विशेष सेवाएं रहती हैं, लेकिन अब तो राखी भी ईमेल से जाने लगी है।

Tuesday, February 2, 2010

'हम' शब्द जिंदगी को बनाता है मजबूत


आप अपनी शादीशुदा जिंदगी को चिरस्थाई बनाना चाहते हैं? इसके लिए अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है केवल इतना भर करना है कि मैं या तुम की बजाय 'हम' शब्द का इस्तेमाल करें। एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने दावा किया है कि दंपति को एक-दूसरे को 'मैं' या 'तुम' की बजाय 'हम' कहकर बात करनी चाहिए। ऐसा करना अधिक सकारात्मक और भावनात्मक व्यवहार को दर्शाता है तथा इससे पति और पत्नी दोनों ही अपने संबंध से अधिक संतुष्ट होंगे।
बर्कले यूनिवर्सिटी के राबर्ट लेवेन्सन की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने अपने शोध में 'तनाव बढ़ाने वाले संवाद' के जरिए 154 जोड़ों को शामिल किया और पोलीग्राफ के जरिए उनकी मनोचिकित्सकीय प्रतिक्रिया की निगरानी की।
शोध में पाया गया कि बुजुर्ग दंपति अधेड़ दंपतियों के मुकाबले 'हम' शब्द का अधिक प्रयोग करते हैं और ऐसा करते समय उनके हृदय की गति में कम उतार चढ़ाव होता है और नकारात्मक भावनात्मक प्रतिक्रिया भी कम रहती है। इसके अलावा दोनों को सकारात्मक भावनात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावनाएं भी अधिक रहती हैं।
'न्यू साइंटिस्ट' में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ऐसा नहीं है कि जो पार्टनर 'हम शब्द' का इस्तेमाल करता है, उसे ही फायदा होता है बल्कि दूसरे पार्टनर पर भी इसका राहतकारी असर होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, दंपति में से यदि कोई एक 'मैं या तुम' शब्द का इस्तेमाल करता है तो इससे संबंधों में 'अलगाव' की भावना पनपती है।
रिपोर्ट में टीम के सदस्यों के हवाले से कहा गया है कि यह 'मैं और तुम' की प्रवृत्ति शादी के लिए 'जहर' है। दंपति अपनी हताशा जाहिर करने के लिए अलगाववादी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो अक्सर गलत प्रभाव डालने वाली और विनाशक होती है।
शोध कहता है कि शादीशुदा जिंदगी के रोजमर्रा के नकारात्मक भावनात्मक प्रभावों को कम करना दोनों के स्वास्थ्य के लिए भी सही रहता है। यदि इस प्रकार की बहस में पति अधिक आक्रोशित होते हैं और नकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो दिल की बीमारियों को न्यौता देते हैं।
शोध रिपोर्ट 'साइकोलोजी एंड ऐजिंग' जर्नल में प्रकाशित हुई हैं।

उंगली में अंगूठी यानी शादी का एहसास


अखिलेश के चेहरे पर मुस्कान और हाथ में चमचमाती अगूंठी यानी हो गई सगाई और होने वाली है शादी। शादी के अलावा ऐसा कोई रिश्ता शायद नहीं जिसकी पहचान हाथों की अंगूठी से हो।
हाल ही में शादी के बंधन में बंधे अखिलेश यूं तो अभी अपनी पत्नी से कोसों दूर हैं, लेकिन उनके दांए हाथ में सोने की अंगूठी उन्हें हर वक्त उनके नए सुनहरे रिश्ते की याद दिलाती है और उनका प्यार बढ़ सा जाता है। वे कहते हैं कि हाथ की यह अंगूठी उन्हें नए रिश्ते का सुखद एहसास कराती हैं और उन्हें पूरा यकीन है कि उनकी दुल्हनिया के हाथों में पड़ी अंगूठी भी उसे तड़पाती होगी।
अगर आपके हाथों में खामोश और आपके गृहस्थी के मूक गवाह वेडिंग अंगूठी की चमक फीकी पड़ गई हो तो साफ करा लें, क्योंकि आज 'वेडिंग रिंग डे' है। सालों से आपके हाथ में पड़े मजबूत बंधन की निशानी इस अंगूठी को लोग वक्त के साथ भूलने लग जाते हैं, लेकिन आज का यह दिन आपको मौका देता है कि आप उस अंगूठी को निकालें देखें और खो जाएं उन स्वप्निल यादों में जब आप एक से दो हुए थे।

कभी सोचा है शादी पर अंगूठी पहनाने की शुरूआत कैसी हुई?

शादी पर अंगूठी पहनाने की परंपरा बहुत पुरानी है और इसकी कहानी बेहद निराली है। ईसाइयों और यहूदियों में इसकी धार्मिक महत्ता है।
ऐतिहासिक तौर पर वेडिंग रिंग यूरोप से निकले। यूरोप में इनका महत्व कीमती वस्तुओं के लेनदेन से था न कि प्यार के एहसास से। एडवर्ड 6 की प्रार्थना पुस्तक के मुताबिक, ईसाइयों में 'इस अंगूठी को पहनाने के साथ मैं तुमसे शादी कर रहा हूं' के बाद कहा जाता है, 'ये सोना और चांदी मैं तुम्हें देता हूं' और इसके साथ ही वर को सोने और चांदी से भरा चमड़े का एक पर्स वधू को देना होता है।'
भारत में यह अंगूठी सगाई के मौके पर पहनाई जाती है, लेकिन विभिन्न परंपराओं में इसकी अलग-अलग भूमिका है। हिंदुओं में कुछ जगह शादी पर अंगूठी के आदान प्रदान के बदले पैर की उंगलियों में बिछिया पहनाई जाती है। हालांकि यह केवल महिलाएं ही पहनती हैं।
भारत के पूर्वी हिस्से और मुख्यत: बंगाल में शादी के समय लोहे का कड़ा पहनाया जाता है जिसे लोहा कहते हैं। अब इन लोहों को सोने और चांदी की शक्ल दिया जाने लगा है।

Sunday, January 31, 2010

नन्हें फरिश्ते को देर से बुलाते हैं कामकाजी दंपति


'डबल इनकम नो किड्स' की श्रेणी में आने वाले महानगरों के कामकाजी दंपति अब ज्यादा उम्र में बच्चों को जन्म देने का विकल्प चुन रहे हैं।
'डबल इनकम नो किड्स' यानी 'डिंक' बने रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण करियर विकसित करना है। इसके अलावा एक तरह का रुझान, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी भी परिवार बढ़ाने में देरी होने का एक कारण है। 'इंडियन इंस्टीट्यूट आफ काउंसलिंग' के अध्यक्ष डॉ. वसंत आर पत्री ने बताया कि शुरुआत में ये दंपति बच्चों के महत्व को नहीं पहचानते, लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है, उनमें अकेलेपन की भावना बढ़ती जाती है। इस तन्हाई को दूर करने के लिए फिर वे बच्चे को जन्म देने का फैसला करते हैं।
शहर के अपोलो अस्पताल स्थित भू्रण चिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉ. अनिता कौल ने बताया कि मैं हर दिन जिन अभिभावकों का परीक्षण करती हूं, उनमें करीब 50 फीसदी 35 वर्ष से अधिक की उम्र के होते हैं। कभी-कभी 40 वर्ष की होने जा रही महिलाएं भी पहले बच्चे को जन्म देने वाली होती हैं।
डॉ. अनिता के मुताबिक, ऐसी लगभग सभी महिलाएं कामकाजी होती हैं। ऐसे अधिकतर दंपति शुरुआत में बच्चे को जन्म नहीं देने की योजना बनाते हैं, लेकिन जब वे अपने संबंधित पेशे में सफलता पा लेते हैं तो फिर वे परिवार बढ़ाने का फैसला करते हैं।
समान तरह के विचार जाहिर करते हुए दिल्ली स्त्री रोग विशेषज्ञ और एंडोस्कोपी विशेषज्ञ सोसायटी की सदस्य डॉ. वीथिका भट्टाचार्य ने बताया कि ज्यादा उम्र में गर्भावस्था के जितने मामले मैं देखती हूं, वे अधिकतर कामकाजी दंपतियों से जुड़े होते हैं जो अपने करियर के लिए देर से बच्चे को जन्म देने का फैसला करते हैं। उन्होंने कहा कि कभी-कभी 30 से 40 वर्ष के बीच की उम्र की महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान गंभीर जटिलताएं पैदा हो जाती हैं।
डॉ. अनिता ने कहा कि बढ़ी हुई उम्र में गर्भावस्था के कारण होने वाली समस्याओं का बच्चे पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में बच्चा डाउन सिंड्रोम या गुणसूत्र संबंधी विकारों से पीडि़त हो सकता है। मां में भी मधुमेह या हाइपर टेंशन की समस्या विकसित होने का खतरा होता है।
समाजशास्त्री शालिनी ग्रोवर ने बताया कि महानगरों में रहने वाले कामकाजी दंपति अन्य शहरों से ताल्लुक रखते हैं। लिहाजा, उनके पास नौकरी पर जाने के दौरान बच्चों की देखभाल करने के लिए परिवार नहीं होता। ऐसे दंपति उन नौकरों के भरोसे अपने बच्चों को नहीं छोड़ना चाहते जो शिशुओं की देखभाल करने की दक्षता नहीं रखते।
'फैमिली काउंसलर' निशा खन्ना ने कहा कि करियर विकसित करने की सोच रखने वाले दंपतियों में 'अच्छा' अभिभावक बनने की चाह बढ़ती जा रही है। कई मामलों में खासकर महिलाएं विवाह के कुछ साल बाद बच्चे को जन्म देने के बारे में सोचने लग जाती हैं, जबकि अन्य मामलों में दंपति परिवार को नहीं बढ़ाने के अपने निर्णय पर टिके रहते हैं।

Saturday, January 30, 2010

त्रिनिदाद में मोबाइल मंदिर


त्रिनिदाद एंड टोबैगो में हिंदुओं ने एक धार्मिक आयोजन के लिए एक विशेष मोबाइल मंदिर की स्थापना की है, जिसमें हनुमान की सात फुट लंबी प्रतिमा स्थापित है।
चलता-फिरता हनुमान मंदिर यहां के विभिन्न शहरों का भ्रमण कर रहा है। इस धार्मिक आयोजन की शुरुआत गुरुवार को हुई थी, जो अगले सात दिनों तक जारी रहेगा।
गौरतलब है कि त्रिनिदाद की कुल आबादी का 44 फीसदी भारतीय मूल के लोग हैं, जिनमें अधिकांश हिंदू हैं। यहां लगभग 147,000 भारतीय 1845 और 1917 के मध्य उत्तर प्रदेश और बिहार से आए थे। धार्मिक आयोजन की व्यवस्था हिंदू उत्सव समाज ने की है।

Wednesday, January 27, 2010

...जहां सात फेरों को तरसते हैं पुरुष


अभी तक तो बेटी के पिता को ही अपनी लड़की के विवाह की फिक्र सताती थी मगर शिवपुरी जिले में ऐसे एक दो नहीं, बल्कि पूरे दो दर्जन से अधिक गांव हैं, जहां कुंवारे युवकों की पूरी फौज मौजूद है और इन गांवों को कुंआरों के गांव के नाम से पुकारा जाने लगा है।
दरअसल इन गांवों में फ्लोराइड युक्त पानी होने के कारण लोग अस्थि विकार का शिकार हो जाते हैं। इसी वजह से आसपास के गांवों के लोग इन गांवों में अपनी बेटी ब्याहने से कतराते हैं। इन गांवों के लोग अपनी लड़कियों की शादी छोटी उम्र में करके उन्हें तो इस बीमारी से बचा लेते हैं, लेकिन सेहरा बांधने की हसरत में उनके लड़कों की उम्र ढल रही है। सूत्रों का कहना है कि फ्लोराइड युक्त पानी वाले गांवों की संख्या और भी तेजी से बढ़ रही है। फ्लोरोसिस से पीडि़त गांवों में लोग अपनी बेटियां ब्याहने से कतराते हैं और पिछले लंबे समय से यहां यह स्थिति देखी जा रही है। अब तो हालत यह है कि लोग इन गांवों को कुंआरों के गांव के नाम से भी पुकारने लगे हैं। शिवपुरी जिले के नरवर और करैरा विकासखंड अंतर्गत मौजूद इन गांवों के पानी में फ्लोरोसिस का जहर घुला हुआ है। ग्राम हथेड़ा, मिहावरा, गोकुंदा, टोडा आदि में फ्लोराइड के आधिक्य ने पानी को विषैला कर डाला है। इस विषैले पानी के सेवन से लोग अस्थि विकृति के शिकार हो रहे है। इस बीमारी की चपेट में आने वाले लोगों में जवानी में ही बुढ़ापे की झलक साफ देखने को मिलती है। दांतों की कतारें बदरंग हो जाती है और कम उम्र में ही दांत गिरने लगते हैं। इन गांवों में अपाहिजों की तादाद भी तुलनात्मक तौर पर चौंकाने वाली है।
बकौल डा. डी के सिरोठिया, फ्लोरोसिस एक दफा अपना प्रभाव जमा ले तो फिर उससे निजात मिलना असंभव सा कार्य है। इसके लिए तो यही कहा जाएगा कि फ्लोरोसिस से बचाव ही इसका इलाज है। उन्होंने बताया कि फ्लोराइड की मात्रा फूलपुर, हतेड़ा आदि क्षेत्रों में तो 5 पीपीएम तक है जबकि एक से 1.5 पीपीएम तक फ्लोराइड की मात्रा पानी में मानव उपयोगार्थ स्वीकार्य है।
नरवर के टुकी क्षेत्र के गोपाल यादव का कहना है कि वह दो जवान बेटियों का बाप है परंतु हतेडा, गोकुंदा आदि ग्रामों में लड़के होते हुए भी वह अपनी बेटियों की शादी इन गांवों में नहीं करेगा। उसका कहना है कि वहां उनकी बेटी की ही नहीं, उसकी भावी संतानों की भी जिंदगी खराब हो जाएगी। फ्लारोसिस की दहशत ने लड़की वालों को इस कदर अपनी जकड़ में ले रखा है कि यहां के पूरे पूरे गांव शहनाई की आवाज को तरस गए हैं। ग्राम फूलपुर के कोमलसिंह, मंशाराम, राजाराम सिंह आदि के घर जवान बेटे मौजूद हैं, जिनकी शादी की उम्र निकलती जा रही है, इनकी शादी की सभी संभावनाएं फीकी है।
राजाराम निराश भाव से कहता है कि अब तो उसने रिश्तों की बाट देखना भी बंद कर दिया है। फूलपुर टोडा हथेडा, महावरा, जरावनी, गोकुंदा आदि में महिला पुरुष अनुपात बेहद असंतुलित है। यहां की बेटियों की शादी तो कम उम्र में आसानी से हो जाती है, लेकिन युवकों का दुल्हन नहीं मिल पाती। ग्रामीण हरज्ञान पाल का कहना है कि फ्लोरोसिस यहां दशकों से है, किन्तु जब से प्रचार माध्यमों ने प्रचारित किया है तभी से गांवों में कुंआरों की संख्या लगातार बढ़ने लगी हैं।
फ्लोरोसिस नामक बीमारी के फैलाव का मुख्य और एक मात्र कारण इन गांवों में पानी के स्त्रोतों का फ्लोराइड प्रभावित होना है। फ्लोराइड ने लोगों के अस्थि तंत्र, तांत्रिका तंत्र और अन्य अंगों को प्रभावित कर डाला है। स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने इस त्रासदी से निपटने के लिए स्थान-स्थान पर डी फ्लोरीडेशन संयत्र स्थापित करने के अलावा नल-जल योजनाओं के जरिए दीगर स्थानों से पानी लाए जाने का प्रयास किया है। क्षेत्र के 30 से अधिक हैंडपंप फ्लोराइड की स्वीकार्य मात्र से अधिकता वाले जल की उपलब्धता के कारण बंद कर लाल रंग से चिंहित कर दिए गए हैं।
रतिराम यादव कहता है कि सब कुछ किया जा रहा है परंतु गांव के बारे में जो धारणा बन चुकी है उसे बदल पाना संभव नहीं है। सरकार हमारी शादी का प्रबंध करने के लिए भी कुछ करे तो बात बने।

Tuesday, January 26, 2010

इंटरनेट पर सेक्स से बच्चे बने समय से पहले बड़े


इंटरनेट की सतरंगी दुनिया ज्ञान का भंडार है, लेकिन इसका एक ऐसा स्याह पहलू भी है, जो छोटी उम्र के बच्चों के सामने सेक्स संबंधी रहस्य उजागर कर रहा है, जो हमारे सामाजिक परिवेश में अब तक ढके-छिपे रहे हैं और जिन्हें एक उम्र से पहले जानना समाज और बच्चे दोनों के लिए घातक हो सकता है। राजधानी के इथोस हेल्थकेयर एंड एजुकेशन से जुड़े मनोचिकित्सक डा. एस के शर्मा कहते हैं कि एक विषय के रूप में यौन के प्रति जिज्ञासा का होना कोई नई या असामान्य बात नहीं है, लेकिन इस विषय की हर जानकारी उम्र के लिहाज से ही दी जानी चाहिए। इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले बच्चों के सामने ऐसी कोई बंदिश नहीं होती। यौन संबंधी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल धीरे-धीरे आदत में तब्दील हो जाता है।
इस संबंध में शर्मा ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि अपर्णा [बदला हुआ नाम] ने महज 14 साल की उम्र में अपने एक दोस्त के कहने पर पहली बार इंटरनेट पर सेक्स के बारे में जानकारी हासिल की और अगले तीन साल में उसे पता भी नहीं चल पाया कि कब वह इसकी आदी हो गई।
उसके माता-पिता को जब उसकी इस आदत के बारे में पता चला तो उन्होंने उसपर तमाम तरह की बंदिशें लगाई और उसका स्कूल तक जाना बंद करवा दिया। उसकी इस लत पर काबू पाने के लिए तमाम जतन किए गए, लेकिन बच्ची के बालमन को समझने और समस्या की जड़ तक जाने की कतई कोशिश नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि बच्ची ने खुदकुशी कर ली।
जाने माने मनोचिकित्सक और यौन मामलों के जानकार डा. संजय चुघ ने कहा कि आदमी का दिमाग हर दबी-छिपी चीज के बारे जानना चाहता है। उसे उस चीज से जितना दूर रखा जाता है वह उसके और करीब जाने के लिए ललचाता है।
मैक्स हेल्थकेयर के मनोचिकित्सक डॉक्टर समीर पारीख कहते हैं कि इंटरनेट पर सेक्स से जुड़ी चीजों की सहज उलब्धता और उन तक बच्चों की बेरोक टोक पहुंच, इस नए चलन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं और सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि अभिभावक बच्चों की इस आदत को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। समाज में अलग-थलग रहने की प्रवृत्ति और उनकी व्यस्त दिनचर्या भी इसकी एक वजह है।
हालांकि शर्मा का मानना है कि मां-बाप लापरवाही के कारण बच्चे की इस आदत की ओर ध्यान नहीं देते। विषय की गंभीरता को देखते हुए उन्हें बढ़ते बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए और बदलते परिवेश में बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए।
इस इंद्रजाल के च्च्चों के कोमल मन पर पड़ने वाले असर पर डा. चुघ कहते हैं कि इंटरनेट पर उपलब्ध सेक्स संबंधी जानकारियों का स्वरूप ऐसा है कि च्च्चे उसे समझने के लिए मानसिक तौर पर सक्षम नहीं हैं। वहां मिलने वाले अधकचरे ज्ञान का उन पर बुरा असर भी पड़ सकता है और वह सेक्स के बारे में गलत छवि बना सकते हैं।
डा. शर्मा कहते हैं कि यौन शिक्षा बहुत जरूरी है, लेकिन उसका उचित माध्यम होना बहुत जरूरी है। स्कूलों में च्च्चों की काउंसलिंग का इंतजाम होना चाहिए। अभिभावक और शिक्षकों का भी इस विषय पर एक दूसरे से समन्वय हो।
चुघ स्कूलों में ऐसे स्वस्थ वातावरण की वकालत करते हैं जहां च्च्चों को उनकी उम्र के हिसाब से सेक्स शिक्षा दी जाए, ताकि उनका बालपन अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए इधर-उधर अधकचरे ज्ञान की तलाश न करे।