Saturday, February 6, 2010

दोस्ती बनाए रखने का माध्यम हैं ग्रीटिंग


कहा जाता है कि सच्चा दोस्त हर सुख-दु:ख में साथ देता है और बिना कहे ही सब कुछ समझ जाता है। ऐसी मित्रता एक अनमोल पूंजी होती है और अगर आपका भी ऐसा कोई मित्र है तो उसे एक प्यारा सा ग्रीटिंग कार्ड भेज कर अपनी भावनाओं का इजहार करने में देर मत कीजिए।
दोस्तों की मित्रता की कद्र करने के लिए कुछ देशों ने एक दिन नियत किया है और यह दिन है सात फरवरी। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चार्टर्ड एकाउंटेंट नीरज अवलाश कहते हैं कि दोस्ती ऐसा रिश्ता है जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। अगर ग्रीटिंग कार्ड के माध्यम से दोस्तों के आगे अपनी भावनाओं का इजहार किया जाए तो दोस्ती की चमक और अधिक निखर जाती है। हालांकि भारत में इस दिन का चलन नहीं है। लेकिन अगर हमारे देश में यह चलन शुरू हो तो बहुत अच्छा रहेगा।
एक काल सेंटर में सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम कर रही प्रिया शर्मा कहती हैं कि मैंने तो सेंड ए कार्ड टू फ्रैंड्स डे के बारे में नहीं सुना। लेकिन मित्रों को याद करने के लिए एक दिन तो होना ही चाहिए। यह अच्छा कॉन्सेप्ट है। वैसे भी, मित्रता अगर निभ जाए तो इससे खूबसूरत रिश्ता दूसरा कोई नहीं हो सकता।
नीरज कहते हैं कि आज व्यस्तता बढ़ गई है और परिवार भी सिमटते जा रहे हैं। ऐसे में मित्र की भूमिका अहम हो जाती है। एक दिन में हम काफी समय मित्र के साथ बिताते हैं। अगर ग्रीटिंग कार्ड के माध्यम से हम उसके प्रति अपनी भावनाएं जाहिर करेंगे तो मुझे लगता है कि उसे बहुत ज्यादा खुशी होगी।
प्रिया कहती हैं कि इस दिन अपने मित्रों के साथ गिले शिकवे भी दूर किए जा सकते हैं। एक प्यारा सा कार्ड भेज कर उन्हें अहसास कराया जा सकता है कि हमारे जीवन में उनका कितना महत्व है।
अमेरिका में कंप्यूटर साइंस एंड एप्लीकेशन्स का अध्ययन कर रहे मयंक सिन्हा का कहना है कि मेरा बचपन बिहार के [अब झारखंड के] धनबाद जिले में बीता है। आगे की पढ़ाई के लिए मैं यूएस गया। लेकिन मेरे दोस्त धनबाद में ही हैं। ई. मेल के माध्यम से मैं उनसे संपर्क बनाए रखता हूं। मेरी कोशिश रहती है कि हमारी दोस्ती बनी रहे। इसके मैं और मेरे दोस्त समय-समय पर ई ़ कार्ड एक-दूसरे को भेजते रहते हैं।
एक माह की छुट्टी पर इन दिनों भारत आए मयंक कहते हैं कि ग्रीटिंग कार्ड का मैटर ऐसा होना चाहिए, जिससे आपकी भावनाएं सामने आएं। दोस्ती के लिए हालांकि ऐसे कार्ड जरूरी नहीं होते, लेकिन मेरी राय है कि इस मित्रता रूपी पेड़ को हरा-भरा बनाए रखने में ये कार्ड खाद पानी का काम करते हैं।

गर्भवस्था में अवसादग्रस्त मां के बच्चे होते हैं अक्खड़


शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर मां गर्भावस्था के दौरान अवसादग्रस्त रहती है, तो उसका बच्चा अपनी आने वाली जिंदगी में बेहद अक्खड़ और हिंसात्मक प्रवृत्ति का हो सकता है।
ब्रिस्टल विश्वविद्यालय, लंदन के किंग कालेज और कार्डिफ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने शोध के लिए 120 ब्रिटिश युवकों पर माताओं के अवसादग्रस्त होने के प्रभाव का अध्ययन किया।
कार्डिफ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डेल एफ. हे कहते हैं कि हमने सबसे ज्यादा ध्यान गर्भावस्था के अवसाद का शिशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव पर दिया, लेकिन इसका असर अजन्मे बच्चे पर भी पड़ता है।
कार्डिफ विश्वविद्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया कि शोध के लिए कई माताओं का गर्भवस्था के दौरान, बच्चे के जन्म देने के बाद और जब उनके बच्चे चार, 11 और 16 साल के थे, साक्षात्कार लिया गया।
अध्ययन से पता चला कि गर्भावस्था में अवसादग्रस्त रहने वाली मां के बच्चों में 16 साल की उम्र में हिंसात्मक व्यवहार उभरने की आशंका चार गुना ज्यादा रहती है। यह बात लड़के और लड़कियों दोनों के मामले में लागू होती है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि यदि कोई महिला अपने किशोरावस्था के दौरान आक्रामक और अशांत प्रवृत्ति की रही है, तो गर्भावस्था के दौरान उसके अवसादग्रस्त हो जाने की आशंका बढ़ जाती है।

Thursday, February 4, 2010

पतंगबाजी पर चढ़ा तकनीक व प्रौद्योगिकी का मुलम्मा


वीडियोगेम और इंटरनेट के इस दौर में कहीं गुम होते जा रही पतंग को बचाने तथा आसमान की सैर कराने के लिए शहर के पंतगबाजों की आकांक्षाएं कुलांचे भरने लगी है और वे अपने उत्साह के डोर को ढील देने के लिए बाकायदा अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी की इस्तेमाल कर रहे हैं।
आकाश में ऊंची, ऊंची और ऊंची उड़ती पतंग देखने में जितना मजा आता है उतना ही आनंद अपनी पतंग को आसमान की सैर कने में आता है। पतंगबाजी अब शौक तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पेशेवर आयोजनों का रूप ले रही है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में टक्कर देने के लिए अब पतंग निर्माण में लगने वाली सामग्री का विदेशों से आयात किया जा रहा है ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय पतंग किसी से पीछे न रहे।
मंगलूर स्थित पतंगबाजी के माहिर और एक स्थानीय पतंग क्लब के सदस्य सुभाष पाई कहते हैं कि देश में पतंगबाजी के शौक को पुनर्जीवित करने की हमारी कड़ी इच्छा है और बच्चों में हम इसके प्रति रुचि जगाना चाहते हैं, जो अब टीवी और वीडियो गेम से चिपके रहते हैं।
पतंगबाजी के इन समर्पित हुनरमंदों ने स्थानीय क्लब का गठन किया है और इस खेल को बढ़ावा देने के लिए वे पतंग उड़ाने के आयोजन तथा पतंग निर्माण की कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं। मनोरंजन उद्योग से प्रेरित होकर काइट क्लबों ने विवाह समारोहों में भी पतंगबाजी का आयोजन करना शुरू कर दिया है।
दहाणू के पेशेवर पतंगबाज अशोक शाह ने कहा कि विवाह में शिरकत करने वाले मेहमानों से हमें उत्साहजनक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। पतंगबाजी में भाग लेने या उसका आनंद उठाने का विचार लोगों को खूब भा रहा है और हमारी योजना इस तरह के और विवाह पतंगबाजी उत्सव आयोजित करने की है।
बहरहाल पेशेवर पतंगबाजी एक महंगा व्यवसाय है। सामग्री के उपयोग और कई दिनों तक लगने वाले श्रम के कारण इसे संचालित करने का खर्च हजारों रुपये में हो सकता है।
हैदराबाद के पतंगबाज श्रीनिवास के अनुसार, इसके उपयोग में आने वाली अधिकतर सामग्री विदेश से आयात की जाती है। पतंग का रिपस्टॉप नाइलॉन महंगा होता है और इसमें रॉड का उपयोग होता है।
उदयपुर के अब्दुल मलिक गाय के आकार वाली पतंग उड़ाकर दर्शकों का आकर्षण का केंद्र बने थे। मलिक ने कहा कि पतंग को अपनी कल्पना के अनुरूप डिजाइन देना और इसे उड़ाने को लेकर एयरोडायनेमिक्स पर काम करना काफी रोचक अनुभव होता है।
मलिक कहते है कि पतंग उड़ना बच्चों का खेल भर नहीं है, बल्कि इसके लिए सोची समझी योजना और समन्वय के साथ काम करना होता है। उनमें से कई ने अपनी कल्पनाओं को मूर्त रूप देने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना शुरू कर दिया है।
पतंगबाजी में तकनीकी विशेषज्ञ भी पीछे नहीं हैं। कंप्यूटर साफ्टवेयर विशेषज्ञ मलिक पतंग का कंप्यूटर सिमुलेशन करते हैं, उसे सही आकार प्रकार देते हैं और बेकार की चीजों को हटाते हैं। उन्होंने कहा कि पतंग को डिजाइन करने के लिए मैं कंप्यूटर का उपयोग करता हूं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा प्रौद्योगिकी के साथ-साथ पतंगबाज निर्माण में उच्च गुणवत्ता की आयातित सामग्री का उपयोग भी कर रहे हैं।
बेंगलूर के वीके राव ने 1989 में अहमदाबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में शिरकत की थी। राव के अनुसार यह शौक बहुत पुष्पित और पल्लवित हो चुका है। अब इसमें नए नए प्रयोग हो रहे हैं। यहां जक्कुर में एक डोर से तीन हजार से अधिक पतंगों को उड़ाकर कीर्तिमान बनाने वाले राव ने कहा कि लगता है लोगों की रूचि इसमें बहुत बढ़ने लगी है।

इंटरनेट से बढ़ता है अवसाद


इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग करने वाले लोग अवसाद का शिकार हो सकते हैं। लीड्स विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए शोध से यह बात सामने आई है।

शोध के दौरान इंटरनेट का उपयोग करने वाले 16 से 51 वर्ष की उम्र के 1319 लोगों के अवसाद स्तर पर नजर रखी गई। इनमें से 1.2 प्रतिशत लोग इंटरनेट के आदी बताए गए।

शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ लोग 'कंपल्सिव इंटरनेट हैबिट' [इंटरनेट से जुड़ी बाध्यकारी आदत] के शिकार हैं। इंटरनेट का उपयोग करने के दौरान चैट-रूम और सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों को इन लोगों द्वारा सामान्य सामाजिक संपर्क के रूप में उपयोग में लाया गया।

लीड्स विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानिकों ने पाया कि इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोग जिस स्तर पर इसके आदी हो चुके हैं, उससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।

शोध में शामिल कैटिरोना मारिसन ने कहा कि इंटरनेट हमारी दैनिक जरूरतों का साधन बन गया है, लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग के कारण हमें काफी नुकसान भी हो रहा है। हम इंटरनेट का उपयोग बिल का भुगतान करने, खरीददारी करने और ईमेल भेजने के लिए करते हैं, लेकिन यह देखना जरूरी है कि आखिरकार हम प्रतिदिन कितने समय तक इंटरनेट का उपयोग करते हैं।

इंटरनेट के आदी लोग आमतौर पर इसका प्रयोग यौन संतुष्टिदायक वेबसाइटों, ऑनलाइन गेम और ऑनलाइन सामुदायिक कार्यो के लिए करते हैं और यही कारण है कि इंटरनेट का कम उपयोग करने वाले लोगों की तुलना में उनके अंदर अवसाद का स्तर अधिक होता है।

Wednesday, February 3, 2010

कहां गुम हो गया खाकी वर्दी में सजा डाकिया!


अब खाकी वर्दी में सजा डाकिया नजर नहीं आता और अगर भूले भटके दिख भी जाए तो पहले जैसी खुशी नहीं होती, क्योंकि सूचना क्रांति के इस दौर में कागज की चिट्ठी पत्री को फोन, एसएमएस और ई ़ मेल संदेशों ने कोसों पीछे छोड़ दिया है।
कुछ देशों में चार फरवरी को ''थैंक्स अ मेलपर्सन डे'' मनाया जाता है, लेकिन जिस तेजी से अत्याधुनिक संचार सेवा का प्रसार हो रहा है उससे लगता है कि बहुत जल्द ही डाक और डाकिया केवल कागजों में सिमटे रह जाएंगे।
समाज शास्त्री प्रो के के मलिक कहते हैं कि एक समय था जब हर घर को डाकिया कहलाने वाले मेहमान का बेसब्री से इंतजार होता था और दरवाजे पर उसके कदमों की आहट घर के लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट ला देती थी। लेकिन आज सूचना क्रांति के इस दौर में यह डाकिया 'लुप्त' होता जा रहा है। अब तो डाकिया नजर ही नहीं आता, जबकि पहले उसकी आहट से लोग काम छोड़ कर दौड़ पड़ते थे।
सूचना क्रांति के इस दौर में घटते महत्व का अहसास डाकियों को भी है। राजधानी के पालम इलाके के एक पोस्टमैन अम्मल मैनी कहते हैं कि अब जो डाक आ जाती है, वह बांट देते हैं। पहले की तरह अधिक डाक अब नहीं आती। अब तो घरों के सामने डिब्बे लगे रहते हैं, उनमें ही डाक डाल दी जाती है। इनाम तो अब सपना हो गया है।
उम्र के 81वें पड़ाव पर पहुंच चुकी निन्ना बक्शी कहती हैं कि डाकिया मेरे लिए खास महत्व रखता था। मेरा परिवार भोपाल रियासत में रहता था और मेरे पिता रियासत में ही एक कारिंदे थे। मेरी शादी ग्वालियर में हुई। पति वायुसेना में एयरमैन थे इसलिए जगह-जगह तबादला होता रहा। अपने माता पिता का हालचाल जानने का एकमात्र माध्यम मेरे लिए चिट्ठी होती थी। मैं तो कभी स्कूल नहीं गई, लेकिन मेरे पति ने मुझे पढ़ना सिखाया था। मैं अपने माता-पिता को चिट्ठियां लिखती थी।
निन्ना कहती हैं कि उनकी खैरियत जानने का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता था। बाद में जब मेरे बच्चे पढ़ने लगे तो मुझे कुछ साल पंजाब के फिरोजपुर में रहना पड़ा और मेरे पति की पोस्टिंग असम के छबुआ में थी। वह भी चिट्ठी लिखते थे। डाकिया आता था तो मैं खुशी से फूली नहीं समाती थी। त्योहारों पर हम डाकिए को इनाम भी देते थे।
कुब्बा सिंह ने देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में कराची के पास स्थित झांग गांव से भारत आकर राजधानी दिल्ली में ऑटो पा‌र्ट्स की दुकान खोली थी। उनके माता पिता और अन्य संबंधी पाकिस्तान में ही रहे।
वे कहते हैं कि चिट्ठी से ही हम एक-दूसरे का हाल जानते थे। मैं तो डाकिए के आने पर चिट्ठी पाकर इतना खुश हो जाता था कि उसे चाय भी पिलाता था।
कुब्बा सिंह कहते हैं कि अगर डाकिया तार ले कर आता था तो लोग घबरा जाते थे। लगता था कि जरूर कोई अशुभ सूचना ही होगी वरना तार नहीं आता। अच्छी खबर तार से कम ही आती थी। अगर तार में अच्छी खबर है तो डाकिए को इनाम देना तय रहता था।
सिंह कहते हैं कि अब मेरा बेटा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है और देश के विभिन्न हिस्सों में तथा कई बार भारत से बाहर भी जाता है, लेकिन वह हमें चिट्ठी लिखने के बजाय फोन पर बात करता है। फोन ही अब डाकिया बन गया है। मैनी कहते हैं कि अब चिट्ठियां कम हो गई हैं। डाक से आने वाली सामग्री में सरकारी कार्यालयों की डाक, पत्रिकाएं, अखबार आदि होते हैं। वैसे भी, लोग कूरियर कंपनियों से पार्सल भेजना पसंद करते हैं। रक्षाबंधन जैसे पर्व पर हमारी विशेष सेवाएं रहती हैं, लेकिन अब तो राखी भी ईमेल से जाने लगी है।

Tuesday, February 2, 2010

'हम' शब्द जिंदगी को बनाता है मजबूत


आप अपनी शादीशुदा जिंदगी को चिरस्थाई बनाना चाहते हैं? इसके लिए अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है केवल इतना भर करना है कि मैं या तुम की बजाय 'हम' शब्द का इस्तेमाल करें। एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने दावा किया है कि दंपति को एक-दूसरे को 'मैं' या 'तुम' की बजाय 'हम' कहकर बात करनी चाहिए। ऐसा करना अधिक सकारात्मक और भावनात्मक व्यवहार को दर्शाता है तथा इससे पति और पत्नी दोनों ही अपने संबंध से अधिक संतुष्ट होंगे।
बर्कले यूनिवर्सिटी के राबर्ट लेवेन्सन की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने अपने शोध में 'तनाव बढ़ाने वाले संवाद' के जरिए 154 जोड़ों को शामिल किया और पोलीग्राफ के जरिए उनकी मनोचिकित्सकीय प्रतिक्रिया की निगरानी की।
शोध में पाया गया कि बुजुर्ग दंपति अधेड़ दंपतियों के मुकाबले 'हम' शब्द का अधिक प्रयोग करते हैं और ऐसा करते समय उनके हृदय की गति में कम उतार चढ़ाव होता है और नकारात्मक भावनात्मक प्रतिक्रिया भी कम रहती है। इसके अलावा दोनों को सकारात्मक भावनात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावनाएं भी अधिक रहती हैं।
'न्यू साइंटिस्ट' में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ऐसा नहीं है कि जो पार्टनर 'हम शब्द' का इस्तेमाल करता है, उसे ही फायदा होता है बल्कि दूसरे पार्टनर पर भी इसका राहतकारी असर होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, दंपति में से यदि कोई एक 'मैं या तुम' शब्द का इस्तेमाल करता है तो इससे संबंधों में 'अलगाव' की भावना पनपती है।
रिपोर्ट में टीम के सदस्यों के हवाले से कहा गया है कि यह 'मैं और तुम' की प्रवृत्ति शादी के लिए 'जहर' है। दंपति अपनी हताशा जाहिर करने के लिए अलगाववादी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो अक्सर गलत प्रभाव डालने वाली और विनाशक होती है।
शोध कहता है कि शादीशुदा जिंदगी के रोजमर्रा के नकारात्मक भावनात्मक प्रभावों को कम करना दोनों के स्वास्थ्य के लिए भी सही रहता है। यदि इस प्रकार की बहस में पति अधिक आक्रोशित होते हैं और नकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो दिल की बीमारियों को न्यौता देते हैं।
शोध रिपोर्ट 'साइकोलोजी एंड ऐजिंग' जर्नल में प्रकाशित हुई हैं।

उंगली में अंगूठी यानी शादी का एहसास


अखिलेश के चेहरे पर मुस्कान और हाथ में चमचमाती अगूंठी यानी हो गई सगाई और होने वाली है शादी। शादी के अलावा ऐसा कोई रिश्ता शायद नहीं जिसकी पहचान हाथों की अंगूठी से हो।
हाल ही में शादी के बंधन में बंधे अखिलेश यूं तो अभी अपनी पत्नी से कोसों दूर हैं, लेकिन उनके दांए हाथ में सोने की अंगूठी उन्हें हर वक्त उनके नए सुनहरे रिश्ते की याद दिलाती है और उनका प्यार बढ़ सा जाता है। वे कहते हैं कि हाथ की यह अंगूठी उन्हें नए रिश्ते का सुखद एहसास कराती हैं और उन्हें पूरा यकीन है कि उनकी दुल्हनिया के हाथों में पड़ी अंगूठी भी उसे तड़पाती होगी।
अगर आपके हाथों में खामोश और आपके गृहस्थी के मूक गवाह वेडिंग अंगूठी की चमक फीकी पड़ गई हो तो साफ करा लें, क्योंकि आज 'वेडिंग रिंग डे' है। सालों से आपके हाथ में पड़े मजबूत बंधन की निशानी इस अंगूठी को लोग वक्त के साथ भूलने लग जाते हैं, लेकिन आज का यह दिन आपको मौका देता है कि आप उस अंगूठी को निकालें देखें और खो जाएं उन स्वप्निल यादों में जब आप एक से दो हुए थे।

कभी सोचा है शादी पर अंगूठी पहनाने की शुरूआत कैसी हुई?

शादी पर अंगूठी पहनाने की परंपरा बहुत पुरानी है और इसकी कहानी बेहद निराली है। ईसाइयों और यहूदियों में इसकी धार्मिक महत्ता है।
ऐतिहासिक तौर पर वेडिंग रिंग यूरोप से निकले। यूरोप में इनका महत्व कीमती वस्तुओं के लेनदेन से था न कि प्यार के एहसास से। एडवर्ड 6 की प्रार्थना पुस्तक के मुताबिक, ईसाइयों में 'इस अंगूठी को पहनाने के साथ मैं तुमसे शादी कर रहा हूं' के बाद कहा जाता है, 'ये सोना और चांदी मैं तुम्हें देता हूं' और इसके साथ ही वर को सोने और चांदी से भरा चमड़े का एक पर्स वधू को देना होता है।'
भारत में यह अंगूठी सगाई के मौके पर पहनाई जाती है, लेकिन विभिन्न परंपराओं में इसकी अलग-अलग भूमिका है। हिंदुओं में कुछ जगह शादी पर अंगूठी के आदान प्रदान के बदले पैर की उंगलियों में बिछिया पहनाई जाती है। हालांकि यह केवल महिलाएं ही पहनती हैं।
भारत के पूर्वी हिस्से और मुख्यत: बंगाल में शादी के समय लोहे का कड़ा पहनाया जाता है जिसे लोहा कहते हैं। अब इन लोहों को सोने और चांदी की शक्ल दिया जाने लगा है।