Thursday, October 21, 2010

अयोध्या में सालभर होती है रामलीला


रामजन्म, सीताहरण, रावणवध और भरत मिलाप जैसे रामलीला के विभिन्न प्रसंगों का मंचन देखने के लिए आपको हर साल नवरात्रि का इंतजार करना पड़ता है, लेकिन अयोध्या में पूरे साल चलने वाली अनवरत रामलीला में प्रतिदिन राम की लीलाओं को देखा जा सकता है।
अयोध्या के तुलसी स्मारक भवन में पिछले छह साल से अनवरत रामलीला का मंचन हो रहा है। अनवरत रामलीला के नियमित दर्शकों में से एक 65 वर्षीय स्थानीय गोकरन प्रसाद वाजपेयी ने कहा कि पिछले छह साल में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो, जब मैंने अनवरत रामलीला नहीं देखी हो। यहां नित्य रामलीला देखना अब मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण दिनचर्या में शामिल हो गया है।
वह कहते हैं कि रामलीला में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन के विभिन्न पहलुओं को देखकर हम नित्य कुछ न कुछ सीखते हैं।
यह अनवरत रामलीला अयोध्या शोध संस्थान के द्वारा कराई जाती है जो उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के अधीन है। संस्थान के निदेशक वी पी सिंह कहते हैं कि 14 मई 2004 को इस रामलीला की शुरुआत की गई। उसके बाद से कोई ऐसा दिन नहीं बीता जिस दिन दर्शकों ने रामलीला न देखी हो।
अनवरत रामलीला के शुरू होने से अब तक यहां पर देशभर के विभिन्न राज्यों से करीब 150 मंडलियां द्वारा 40 विभिन्न शैलियों में रामलीलाओं का मंचन किया जा चुका है।
सिंह कहते हैं कि यहां प्रदेश की वाराणसी, बरेली, मथुरा, बुंदेलखंड, वृंदावन और इलाहाबाद की मंडलियों के अलावा उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, झारखंड और कर्नाटक से मंडलियां रामलीला करने आती हैं।
एक मंडली को 15 दिन तक रामलीला करनी होता है। महीने में दो मंडली और साल में 24 मंडलियों द्वारा अनवरत रामलीला मंचित की जाती है। मंडलियों का चयन अयोध्या शोध संस्थान द्वारा किया जाता है।
सिंह कहते हैं कि हर साल नवंबर में हम लोग अनवरत रामलीला के लिए विज्ञापन देते हैं। दिसंबर तक आवेदन मांगे जाते हैं और जनवरी में अनवरत रामलीला में शामिल होने वाली मंडलियों के नाम फाइनल किए जाते हैं।
यहां आने वाली रामलीला मंडलियों को 75 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक का भुगतान किया जाता है। इस समय मध्य प्रदेश के सतना की शारदा मंडली द्वारा रामलीला का मंचन किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि 500 सीटों वाले तुलसी स्मारक भवन के थियेटर में हर रोज सैकड़ों लोग शाम 6 बजे से रात बजे तक रामलीला का आनंद लेते हैं। अनवरत रामलीला देखने के लिए लोगों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है।
प्रतिदिन रामलीला देखने आने वाले महंत नृत्य गोपाल दास ने संस्थान के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि अनवरत रामलीला केवल स्थानीय ही नहीं, देश-विदेश के लोग साल में किसी भी समय यहां आकर राम की लीलाएं देख और सुन सकते हैं।

Thursday, September 2, 2010

यहां गीता व कुरान की पूजा होती है साथ-साथ


यदि आप सांप्रदायिक सद्भाव और सर्वधर्म-संभाव की झलक देखना चाहते हैं तो इंदौर के राधा-कृष्ण मंदिर चले आइए, जहां भगवत गीता और कुरान एक साथ रखे हैं। इतना ही नहीं यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर दोनों धार्मिक ग्रंथों की साथ में पूजा करने का दौर भी लगभग 100 से अधिक वर्षो से चला आ रहा है, जो आज भी जारी है।
आड़ा बाजार इलाके में त्रिवेदी परिवार का राधा-कृष्ण मंदिर है। इस मंदिर में राधा-कृष्ण की प्रतिमा के साथ भगवत गीता और तीन भाषाओं अरबी, हिंदी और संस्कृत में कुरान भी रखी है।
इस मंदिर में गुरुवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही है। वर्षो से चली आ रही परंपरा के मुताबिक इस बार भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर तमाम धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दोनों धार्मिक ग्रंथों की पूजा की गई।
मंदिर के पुजारी किशोर जोशी का कहना है कि भगवत गीता की ही तरह कुरान भी ग्रंथ है लिहाजा ये दोनों ग्रंथ हमारे मार्गदर्शक हैं और सद्मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं। इसी कारण वर्षो से ये दोनों ग्रंथ एक साथ रखे हुए हैं और जन्माष्टमी के मौके पर भगवत गीता के साथ कुरान की भी पूजा होती है।
बताया गया है कि त्रिवेदी परिवार लगभग सात पीढि़यों से इस परंपरा को निभा रहा है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि जिस तरह तमाम नदियां जाकर समुद्र में मिलती हैं ठीक इसी तरह तमाम धार्मिक ग्रंथ अलग-अलग रास्तों से जाकर प्रभु से मिलाने का काम करते हैं।

Saturday, August 28, 2010

पालक-गाजर खाईये और कम कीजिए वजन


अगर आप बढ़ते वजन पर नियंत्रण पाने में सारे उपाय करने के बाद भी सफल नहीं हुए हैं, तो आपको एक आसान सा उपाय इस परेशानी से निजात दिला सकता है। ये आसान उपाय है, हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन।
चिकित्सकों का मानना है कि हरी पत्ती वाली सब्जियां महिलाओं के लिए हर तरह से फायदेमंद हैं क्योंकि ये हड्डियों को भी मजबूत करने में मददगार होती हैं।
फिजिशयन डॉ. संध्या जौहरी कम कैलोरी युक्त होने के कारण हरी सब्जियों को 'वजन प्रबंधन' के लिए सर्वश्रेष्ठ तरीके की संज्ञा देती हैं।
डॉ. संध्या ने बताया कि लड़कियां वजन कम करने के लिए डायटिंग करती हैं, अगर डायटिंग की जगह पालक और गाजर जैसी सब्जियों का सूप पिएं, तो वजन धीरे-धीरे घटने लगे। इन सब्जियों में फैट भी कम होता है, इसलिए ये हृदय रोगों की आशंका भी कम करती हैं।
उन्होंने बताया कि हरी पत्तेदार सब्जियों के पूरे गुण तब मिल सकते हैं, जब आप उन्हें कच्चा खाएं। उन्हें उबालने से उनके तत्व नष्ट हो जाते हैं।
दूसरी ओर स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मृदुला आंजिक्य पालक और मेथी जैसी सब्जियों को लौह अयस्क युक्त होने के कारण महिलाओं के लिए फायदेमंद बताती हैं।
डॉ. मृदुला ने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन महिलाओं में कैल्शियम की कमी हो, उन्हें भी अपने भोजन में इन भाजियों को शामिल करना चाहिए।
डॉ. मृदुला ने कहा कि एक उम्र के बाद महिलाओं की हड्डियों में कैल्शियम की कमी हो जाती है। महिलाएं अगर अपने भोजन में हर दिन हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करें, तो उनमें कहीं भी फ्रैक्चर होने की आशंका 45 फीसदी तक कम हो जाती है।
बच्चों के भोजन में इन सब्जियों की महत्ता बताते हुए शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सैबल गुप्ता ने कहा कि जिन बच्चों की दृश्य क्षमता कम हो, उनके भोजन में इन्हें शामिल करने से आंखों की रोशनी में लगातार इजाफा होता है।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि बहुत से बच्चों की आंखें टीवी देखने और अन्य कारणों के चलते बचपन में ही कमजोर हो जाती हैं। ऐसे बच्चों को पालक, लाल भाजी और सरसों की भाजी खिलाने से उनकी आंखों की रोशनी बढ़ती है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों लंदन में हुए एक शोध में कहा गया था कि शहर के पांच से 10 वर्ष के बच्चों में कार्टून कैरेक्टर 'पॉपोय द सेलर' को देख कर पालक खाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस प्रवृत्ति के कारण उनकी आंखों की रोशनी में भी इजाफा हो रहा है।
पॉपोय एक कार्टून कैरेक्टर है, जो हर समय पालक खाता है और इससे मिलने वाली शक्ति की बदौलत अपने दुश्मनों को चारों खाने चित्त करता है।

Thursday, August 26, 2010

अब कृत्रिम कार्निया से लौटेगी आंखों की रोशनी


प्रयोगशाला में निर्मित कृत्रिम कार्निया के प्रत्यारोपण के जरिए चिकित्सकों ने कई मरीजों की आंखों की रोशनी लौटाई है। दुनिया में ऐसा पहली बार हुआ है इससे लाखों दृष्टिहीनों के लिए उम्मीद पैदा हुई है।
इस नई तकनीक के जरिए मानव शरीर के ऊतकों को प्रयोगशाला में कार्निया की तरह विकसित किया जाता है।
स्थानीय समाचार पत्र 'द टेलीग्राफ' में प्रकाशित समाचार के मुताबिक चिकित्सकों ने मरीज की आंख के अगले हिस्से में क्षतिग्रस्त कार्निया को पूरी तरह हटाकर उसके स्थान पर कृत्रिम कार्निया का प्रत्यारोपण किया।
इसके बाद चिकित्सकों ने आंख की मौजूदा कोशिकाओं और तंत्रिकाओं को कृत्रिम कार्निया से जुड़ाव स्थापित करने के लिए अनुकूल स्थितियां पैदा कीं।
कार्निया आंख का वह हिस्सा या लैंस होता है जो देखने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है।
दुनियाभर में आंखों की बीमारियों के दौरान कार्निया के क्षतिग्रस्त होने से बड़ी संख्या में लोग अंधे हो जाते हैं। दुनियाभर में फिलहाल ऐसे लोगों की संख्या एक करोड़ है।
चिकित्सकों ने प्रत्यारोपण के पहले परीक्षण में ही सफलता प्राप्त कर ली थी और बाद में इस प्रत्यारोपण से कई मरीज देख पाने में सक्षम हुए।
इस शोध का नेतृत्व कर रहे स्वीडन के लिंकोपिंग विश्वविद्यालय के मे ग्रीफित्स ने कहा कि हम इन परिणामों से बेहद उत्साहित हैं। इस परीक्षण से साबित हुआ है कि कृत्रिम कार्निया आंख के अन्य अंगों से जुड़ सकती है।
उन्होंने कहा कि इस पर कुछ और शोधों के बाद इससे लाखों दृष्टिहीन लोगों को देखने में सक्षम बनाया जा सकता है जो कि अभी कार्निया दान किए जाने का इंतजार करते हैं।

Wednesday, August 25, 2010

बच्चों के लिए फायदेमंद है मछली


मछली खाना बच्चों के दिमागी और तंत्रिका संबंधी विकास के लिए बेहद जरूरी है।
इलिनाय विश्वविद्यालय के कालेज आफ एग्रीकल्चरल साइंसेज की खानपान विशेषज्ञ सुजान ब्रेवेर ने कहा कि बच्चों को काफी मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड की जरूरत होती है। यह दिमाग, स्नायु और आंखों के विकास के लिए बहुत जरूरी है। बच्चों के लिए मछली खाना उस समय ज्यादा जरूरी होता है जब वे मां का दूध छोड़ने के बाद ठोस आहार अपनाने लगते हैं।
ब्रेवेर मानती हैं कि पांच वर्ष की उम्र का होते-होते बच्चों में खानपान संबंधी आदत बन जाती है। इस दौरान उनके अंदर खाने पीने की वस्तुओं को लेकर पसंद और नापसंद भी विकसित हो जाती है। ऐसे में माता-पिता को उनमें मछली जैसे व्यंजन की आदत डालना जरूरी है।
सालमन नाम की मछली में ओमेगा-3 फैटी एसिड सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है। इस एसिड के कारण बच्चों के अंदर धमनियों से संबंधित बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है, लेकिन सच्चाई यह है कि व्यस्क लोग भी सप्ताह में दो बार मछली खाना पसंद नहीं करते।

Thursday, August 19, 2010

अनूठा है देवघर का ज्योतिर्लिग


झारखंड के देवघर जिला स्थित वैद्यनाथ धाम सभी द्वादश ज्योतिर्लिगों से भिन्न है। यही कारण है कि सावन में यहां ज्योतिर्लिग पर जलाभिषेक करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।
वैद्यनाथधाम मंदिर के प्रांगण में ऐसे तो विभिन्न देवी-देवताओं के 22 मंदिर हैं परंतु मध्य में स्थित बना शिव का भव्य और विशाल मंदिर कब और किसने बनाया यह गंभीर शोध का विषय है। मंदिर के मध्य प्रांगण में शिव के भव्य 72 फुट ऊंचे मंदिर के अन्य 22 मंदिर हैं। मंदिर प्रांगण में एक घंटा, एक चंद्रकूप और मंदिर प्रवेश हेतु एक विशाल सिंह दरवाजा भी है।
यहां मनोरथ पूर्ण करने वाला कामना द्वादश ज्योतिर्लिग स्थापित है। यही नहीं इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि किसी भी द्वादश ज्योतिर्लिग से अलग यहां के मंदिर के शीर्ष पर 'त्रिशूल' नहीं बल्कि 'पंचशूल' है।
अभी सावन के समाप्त होने में करीब एक सप्ताह का समय शेष है परंतु सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक यहां पहुंचने वाले शिवभक्तों की संख्या 33 लाख को पार कर चुकी है। इनमें 11 लाख से ज्यादा महिलाएं हैं।
पंचशूल के विषय में धर्म के जानकारों का अलग-अलग मत है। पंचशूल के विषय में मान्यता है कि यह त्रेता युग में रावण की लंका के बाहर सुरक्षा कवच के रूप में भी स्थापित था। उल्लेखनीय है कि धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक रावण जब शिवलिंग को कैलाश से लंका ले जा रहा था। भगवान विष्णु ने एक ग्वाले के वेश में रावण से इस शिवलिंग को लेकर यहां स्थपित किया था।
मंदिर के तीर्थ पुरोहित दुर्लभ मिश्रा के मुताबिक धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि रावण को पंचशूल के सुरक्षा कवच को भेदना आता था जबकि इस कवच को भेदना भगवान राम के भी वश में भी नहीं था। विभीषण द्वारा बतायी गई उक्ति के बाद ही राम और उनकी सेना लंका में प्रवेश कर सकी थी। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि आज तक इस मंदिर को किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ।
इधर, धर्म के जानकार पंडित सूर्यमणि परिहस्त का कहना है कि पंचशूल का अर्थ काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा ईष्र्या जैसे शरीर में पांच शूलों से मुक्त होने का प्रतीक है। जबकि पंडित कामेश्वर मिश्र ने इस पंचशूल को पंचतत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीरा से बने इस शरीर का द्योतक बताया।
मंदिर के पंडों के मुताबिक मुख्य मंदिर में स्वर्णकलश के ऊपर स्थापित पंचशूल सहित यहां के सभी 22 मंदिरों में स्थापित पंचशूलों को वर्ष में एक बार शिवरात्रि के दिन मंदिर से नीचे लाया जाता है तथा सभी को एक निश्चित स्थान पर रखकर विशेष पूजा-अर्चना कर पुन: वहीं स्थापित कर दिया जाता है।
ज्ञात हो कि पंचशूल को मंदिर से नीचे लाने और ऊपर स्थापित करने के लिए सिर्फ एक ही परिवार के लोगों को मान्यता मिली है। इसी खास परिवार के लोगों द्वारा यह कार्य किया जाता है।

Saturday, August 14, 2010

चीजों को याद रखने के लिए देखे सपने...


जब भी लोग बिस्तर पर जाते हैं एक दूसरे को 'शुभरात्रि' और 'अच्छे सपने देखिए' कहना नहीं भूलते हैं। भले ही ऐसा वो शिष्टाचारवश या हमारे मंगल कामना के लिए कहते हों, लेकिन हाल के एक अध्ययन से यह बात सिद्ध हुई है कि सपने देखने से चीजों को याद रखने में सहायता मिलती है।
डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि सपने देखने से दिमाग में याद्दाश्त के संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। वास्तव में जब हम सोते हैं तो उस समय हमारी आंखे गतिशील रहती हैं और हम सपना देखते हैं। यह प्रक्रिया एक तरह से याद्दाश्त के साथ जुड़ी होती है।
इस शोध को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की नींद विशेषज्ञ डॉक्टर सारा मेडनिक ने किया है। उन्होंने अपने इस शोध के तहत लोगों के एक समूह की स्मरण शक्ति से संबंधित एक साधारणा सी जांच परीक्षा ली। यह पाया गया कि जिन लोगों को आंखों की गति के साथ झपकी लेने दी गई थी उनकी स्मरण शक्ति और इस जांच के परिणाम में 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई।
इस बारे में डॉ. मेडनिक ने कहा कि हम रोजाना जितने तरह की सूचनाएं ग्रहण करते हैं उनको स्मरण शक्ति के द्वारा संजोकर रख लेने और बाद में उपयोग करने के लिए आंखों की गतिशीलता के साथ सोना महत्वपूर्ण है।

Friday, August 13, 2010

सावन में गूंजती है भोजपुरी लोकगीतों की गूंज


यूं तो सावन के मनभावन महीने में पूरा उत्तर भारत ही बूंदों की अठखेलियों और बादलों की आंख-मिचौली के बीच हर तरफ बिखरी हरियाली का आनंद लेता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्वाचल क्षेत्र में इस दौरान भोजपुरी लोकगीतों की गूंज के साथ सावन की एक अलग छटा दिखाई देती है।
पूर्वाचल में इस पूरे माह को एक त्यौहार के रुप में मनाया जाता है और जहां खेत, खलिहान और बाग-बगीचों में हरियाली छाई रहती है। वहीं, सभी के मन में एक अजीब सा उत्साह हिलोरे लेता हुआ गांव-गांव, गली-गली भोजपुरी लोकगीतों को गाया जाता है।
सावन महीने में पड़ने वाली नाग-पंचमी के दिन तो एक खास उत्साह पूरे पूर्वाचल पर छाया रहता है और खासकर युवतियों और नवविवाहिता लड़कियां झुंड बनाकर पेड़ों की डालों पर पड़े झूलों के ऊंचे हुलारे लेती हुई अपनी सखियों के संग भोजपुरी लोकगीत गाती हैं।
सावन के झूले के साथ गाए जाने वाले गीतों में संयोग और वियोग रस के गीतों की भरमार रहती है और साथ ही राधा-कृष्ण के प्रसंगों का जिक्र भी इन गीतों में भरपूर पाया जाता है।
इस माह में सुहागन अपने प्रिय को अपने आसपास ही चाहती है और उसे सावन का महीना अपने प्रिय के बिना च्च्छा नहीं लगता..''
हमके ना भावे हो सावन बिना सजनवा हो ननदी।''
...तो कहीं झूलों पर झूलती सजी संवरी युवतियां..,
राधा संग में झूला झूले बनवारी हे गोइया.. और
घेरि-घेरि आई घटा कारी-कारी सखिया..
के गीत कानों में अमृत रस घोलते है।
आज की आधुनिकतावादी, भागदौड़ और शहरी संस्कृति में ये प्राचीन परंपराएं कम जरुर हो रही है, परन्तु आज भी पूर्वाचल के गांवों में इसका विशेष महत्व है।
नागपंचमी के दिन यह एक सांस्कृतिक त्यौहार की तरह मनाया जाता है और झूला झूलने का क्रम पूरे एक महीने चलता है तथा गांवों में महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर श्रृंगार करके झूला झूलते समय कजरी गाती है।
महिलाओं का झुंड बगैर किसी तैयारी के रात भर नाटक नौटंकी भी करती हैं और जब वह एक सुर में गीत गाती है तो पूरे माहौल में एक अजीब सी मस्ती रात के सन्नाटे को तोड़ती हुई हर किसी के मन में गुदगुदी पैदा कर देती है।

Wednesday, August 11, 2010

जूते पॉलिश कर भाई के इलाज के पैसे जुटा रही हैं बहनें


गंभीर बीमारी से पीडि़त अपने भाई के इलाज के लिए उत्तर प्रदेश के कानपुर की दो बहनें जो कर रही हैं, वह दुनिया की हर बहन के लिए एक नजीर है।
सृष्टि [15] और मुस्कान [9] नाम की दो बहनें अविकासी रक्ताल्पता [अप्लास्टिक एनीमिया] से पीडि़त अपने भाई अनज [14] के इलाज का पैसा जुटाने के लिए पिछले कुछ समय से शहर के विभिन्न इलाकों में लोगों के जूतों में पॉलिश करने का काम कर रही हैं।
कानपुर शहर के खलासी लाइन इलाके में रहने वाली इन बहनों के पिता पेशे से एक स्कूटर मैकनिक हैं, जो बेटे के इलाज के लिए अपना सब कुछ गिरवी रख चुके हैं।
पिता मनीष बहल [43] ने कहा कि 'चिकित्सकों का कहना है कि मेरे बेटे का अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण [बोन मैरो ट्रांसप्लांट] करना पड़ेगा, जिसमें करीब 20 लाख रुपये का खर्च आएगा। मेरी बेटियों को यह बात पता है कि उनके पिता अकेले इलाज के लिए इतने सारे पैसे नहीं जुटा सकते हैं। इसलिए वे कठिन मेहनत से पैसे इकट्ठा करके अपने पिता का सहारा देने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि वैसे तो मुझे पता है कि मेरी बेटियां जूते पॉलिश करके कभी भी 20 लाख रुपये नहीं जुटा सकती हैं, लेकिन उनका जज्बा और कठिन परिश्रम मुझमें सकारात्मक सोच का संचार करता हैं। मुझे ऐसी बेटियों का पिता होने पर गर्व महसूस होता है।
अविकासी रक्ताल्पता एक असाध्य रक्त विकार होता है, जिसमें अस्थि मज्जा पर्याप्त नई रक्त कणिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता है। यह रक्त विकार, गंभीर होने पर जानलेवा हो जाता है।
दोनों बहनें हाथ में 'मेरे भाई को बचाओ' लिखी तख्ती लेकर शहर के अलग-अलग मुहल्लों, बाजारों, बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन जैसे भीड़-भाड़ वाले जगहों पर जाकर लोगों से जूते-चप्पल पॉलिश कराने का अनुरोध करती हैं।
कक्षा पांच में पढ़ने वाली मासूम मुस्कान कहती हैं कि मैं अपने भाई को जल्द से जल्द घर ले जाना चाहती हूं। भाई के इलाज के पैसे जुटाने के लिए मै कठिन परिश्रम करूंगी। मेहनत से इकट्ठा किये पैसे हम चिकित्सकों के देंगे जो हमारे भाई का इलाज करेंगे।
हर दिन सृष्टि और मुस्कान स्कूल से वापस लौटने के बाद अपने काम पर निकल पड़ती हैं।
बहल के मुताबिक दोनों बेटियों ने उन्हें बताया कि कई लोग उनके गले में तख्ती देखकर उनके भाई के बारे में पूछते हैं। हमारे परिवार के हालात सुनकर कुछ लोग 50 से 100 रुपये की मदद कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि हम मददगार लोगों की भावनाओं का दिल से सम्मान करते हैं। वैसे ये बड़ा सत्य है कि हमें अनुज को बचाने के लिए एक बड़ी धनराशि की जरूरत है।
फिलहाल कानपुर के आर एल रोहतगी अस्पताल में अनुज का उपचार चल रहा है, जहां उसकी हालत बिगड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।
बहल कहते हैं कि असल में जन्म के दो महीने बाद ही अनुज अविकासी रक्ताल्पता से ग्रसित हो गया था। किसी तरह पूर्वजों द्वारा छोड़ा गया कीमती सामान और गहने गिरवी रखकर मैं उसका उपचार करवा रहा हूं।
उन्होंने कहा कि अपने बेटे के उपचार के लिए मैंने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बाहर के कई चिकित्सकों से परामर्श किया। बाद में मुंबई के एक चिकित्सक की देखरेख में अनुज की हालत बेहतर होने लगी। चिकित्सक ने कहा कि अनुज का हर छह माह में रक्त आधान [ब्लड ट्रांसफ्यूजन] करवाना पड़ेगा। साथ ही उसे कुछ दवाइयों की भी आवश्यकता होगी।
उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे 1998 के बाद अनुज के सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया, लेकिन जुलाई 2009 में एक बार फिर उसकी हालत बिगड़ गई।
अपने बेटे के उपचार पर करीब 15 लाख रुपये खर्च कर चुके बहल को चिकित्सकों ने बताया कि अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से ही उनके बेटे की जान बच सकती है।
फिलहाल अनुज का इलाज कर रहे आर एल रोहतगी अस्पताल के चिकित्सक ए के पांडे ने कहा कि मैंने अनुज की जांच रिपोर्ट का अध्ययन किया है। उसे अतिविशिष्ट चिकित्सीय सुविधाओं वाले अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता है, जहां पर उसका अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण हो सके।

Saturday, August 7, 2010

माइका की चादरों के बीच हुई जीवन की उत्पत्ति


धरती पर जीवन की शुरुआत कब हुई? इस लाख टके के अर्से पुराने सवाल का एक नया जवाब सामने आया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ सम्भवत: खनिज माइका की चादरों के बीच हुआ।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के एक दल ने 'लाइफ बिटवीन द शीट्स' माइका परिकल्पना तैयार की है। इसके बारे में 'जर्नल ऑफ थेयोरेटिकल बायोलॉजी' के आगामी अंक में विस्तार से जिक्र किया गया है।
'लाइफ बेटवीन द शीट्स' मिका परिकल्पना के मुताबिक मिका की परतों के बीच आमतौर पर बनने वाले संरचित कक्षों में सम्भवत: ऐसे अणु संरक्षित हुए होंगे जिनसे आगे चलकर कोशिकाओं का निर्माण हुआ।
संरचित कक्षों में सही भौतिक और रासायनिक वातावरण मिलने से फले-फूले अणु बाद में कोशिकाओं में तब्दील हुए।
अध्ययन दल की मुख्य वैज्ञानिक हेलेन हंसमा ने कहा कि चूंकि माइका की परतें जीवित कोशिकाओं तथा प्रोटीन, न्यूक्लियक अम्ल, कार्बोहाइड्रेट्स और वसा जैसे बड़े जैविक अणुओं के जीवन के लिए अनुकूल होती हैं इसलिए माइका परिकल्पना भी अन्य मशहूर परिकल्पनाओं की इस राय से सहमत है कि जीवन का आरम्भ राइबोन्यूक्लिक एसिड [आरएनए], वसायुक्त वैसिलेस और आदिम चयापचय के रूप में हुआ था।
उन्होंने कहा कि हो सकता है कि माइका में सभी प्राचीन चयापचयों, वसा वैसिलेस और आरएनए की दुनिया समाई रही हो।

Thursday, August 5, 2010

अब राह चलेत पढि़ए कामसूत्र का पाठ


यदि आप कामसूत्र का पाठ पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अब इस किताब को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस पुस्तक को एक 'ऑडियो बुक' का रूप दिया जा चुका है। इससे आप कहीं भी और कभी भी इसे आसानी से सुन सकते हैं।
वेबसाइट 'एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक ब्रिटेनवासी अब इस पुरानी पुस्तक को अपने घर में अथवा बस या रेलगाड़ी में सफर करते समय भी सुन सकते हैं।
इस ऑडियो का प्रकाशन करने वाले 'ब्यूटीफुल बुक्स' को उम्मीद है कि उसकी इस पहल से नई पीढ़ी के लोग 1,600 साल पहले मित्रता, शादी और संबंधों के बारे में लिखी गई पुस्तक के बारे में आसानी से जान सकते हैं।
ऑडियो में इस पुस्तक की व्याख्या करने वाली ब्रिटेन की टेलीविजन स्टार तान्या फ्रैंक ने कहा कि जब मुझे कामसूत्र को पढ़ने के लिए कहा गया तो मैं काफी परेशान और उत्साहित भी थी।
फ्रैंक ने कहा कि जब हमने इसे पूरा कर लिया तो काफी राहत महसूस हुई।
ब्यूटीफुल बुक्स के प्रबंध निदेशक सिमोन पैथरिक कहते हैं कि अब इस किताब को पढ़ने के लिए शर्मिदा होने की आवश्यकता नहीं हैं। आप इसे अपने एमपी-3 प्लेयर पर आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं।
ऑडियो कामसूत्र की कीमत 14.2 डॉलर है और इसे 'ब्यूटीफुल-बुक्स डॉट को डॉट यूके' से डाउनलोड भी किया जा सकता है।

Wednesday, August 4, 2010

चीनी मांझा से पुश्तैनी कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का सवाल


वैश्वीकरण के दौर में चीन का सामान भारत के बाजारों पर काबिज होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों से रंग-बिरंगी पतंग उड़ाने में काम आने वाले बरेली के मशहूर मांझे पर भी अब चीनी मांझे की मार पड़नी शुरु हो गई है, जिससे पुश्तैनी कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का सवाल उत्पन्न हो गया है।
मांझा और पतंग कारोबार में देश भर के तकरीबन तीन लाख कारीगर काम करते हैं और पिछले दो सालों से कारखानों में रसायनों एवं धातुओं के अंश मिश्रित चीनी मांझे ने हाथ से निर्मित मांझा कारोबार पर असर डालना शुरू कर दिया है।
हाथ से बने मांझे की तुलना में चौथाई कीमत पर उपलब्ध चाइनीज मैटेलिक मांझे के कारण बरेली सहित देश भर के मांझा कारीगरों को बेकारी और भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया है। हालांकि, मांझा कारोबार बचाने के लिए सामाजिक संगठन, श्रमिक संगठन, बुद्धिजीवियों ने मुहिम शुरू कर दी है।
देश भर में बरेली का हस्तनिर्मित मांझा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यही कारण है कि भारत सहित विदेश में भी बरेली के मांझे की अपनी अलग पहचान है।
हस्तनिर्मित मांझा रोजगार बचाओ आंदोलन के जनक एवं लोकाधिकार संस्था के राज्य समन्वयक हरीश पटेल ने बताया कि संस्था द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि चीनी [मैटेलिक] मांझे का कारोबार यूं ही बढ़ता रहा तो स्वदेशी हस्तनिर्मित मांझे का कारोबार समाप्त हो जाएगा और अगले दो वर्षो में दो लाख माझा कारीगर बेरोजगार हो जाएंगे।
पटेल ने बताया कि पूरे देश में लगभग 125 करोड़ रुपये के मांझे का कारोबार होता है, जिसमें अकेले बरेली में 60 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार होता है।
मांझा कारीगरों के बीच काम करने वाले पूर्व मेयर एवं रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व गर्वनर डा. आई. एस. तोमर ने कहा कि चीनी मांझे में घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार, बरेली शहर में मांझा कारोबार से जुड़े 30 हजार परिवार आर्थिक विपन्नता की मार झेल रहे है। मांझा कारीगरों को किसी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिल रही है। इस व्यवसाय को कुटीर उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया है।
मांझा कारीगर इनाम अली कहते हैं कि हस्तनिर्मित मांझे में सुहागा, चावल, प्राकृतिक रंग लोवान, छाल, बोरिक पाउडर जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने बताया कि मांझा कारीगरों की मांझा निर्माण की शैली परम्परागत है और इनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है और न ही ऋण प्राप्ति के स्रोत हैं।
उन्होंने बताया कि मांझा कारोबारियों के प्रति सरकार का उपेक्षित और उदासीन रवैया पहले से था और अब वैश्विक बाजार की आड़ में चीनी मांझे के भारतीय बाजार में आने से मांझा कारोबारियों की कमर टूट गई है। चीनी मांझा हस्तनिर्मित स्वदेशी मांझे की अपेक्षा एक चौथाई कीमत पर उपलब्ध हो जाता है।
विभिन्न संगठनों द्वारा चीनी मांझे पर रोक की मांग की जा रही है क्योंकि यह जब कम दाम पर विकल्प उपलब्ध कराता है तो कोई अधिक दाम क्यों देगा? चीनी मांझे के कारण हस्तनिर्मित मांझा कारीगरों की आय निम्न स्तर पर पहुंच गई है, जिसके कारण मांझा कारीगर तंगहाली में अपना जीवनयापन कर रहे हैं और परिणाम स्वरुप पलायन को मजबूर है।
मांझा कारोबारियों की स्थिति के मद्देनजर केंद्र एवं राज्य सरकार को बेहतर कदम उठाने चाहिए और मांझा कारोबारियों की आर्थिक मदद के लिए आगे आना चाहिए। मांझा कारोबार को कुटीर उद्योग का दर्जा प्रदानकर उन्हें सरकारी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
पटेल बताते हैं कि बरेली के हस्तनिर्मित मांझे को महाराष्ट्र में सर्वाधिक पसन्द किया जाता है और नासिक, नागपुर तथा मुंबई में बरेली निर्मित मांझे के शौकीनों की खासी संख्या है। इसके साथ ही देश के अन्य भागों दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात में भी बरेली का मांझा लोकप्रिय है।
बरेली का हस्तनिर्मित मांझा मुंबई के रास्ते इण्टर नेशनल स्टैण्डर्ड पैकिंग के साथ फ्रांस, कोरिया, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और पाकिस्तान तक जाता है जहां विभिन्न मौकों पर पतंगबाजी का लुभावना खेल खेला जाता है।
विभिन्न संगठनों की मांग है कि सरकार चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाए और स्वदेशी मांझा कारीगरों के हितों की रक्षा करें। वरना बरेली के 30 हजार तथा देश के तीन लाख मांझा कारीगरों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और देश की प्रमुख धरोहर अतीत के गर्भ में समा जाएगी।

Tuesday, August 3, 2010

महिलाओं को लाल रंग में ज्यादा आकर्षक लगते हैं पुरुष


यदि आप महिलाओं को आकर्षित और उन्हें अपने करीब लाना चाहते हैं तो लाल रंग का चुनाव कीजिए। महिलाओं को वे पुरुष ज्यादा आकर्षक लगते हैं जो लाल रंग के वस्त्र पहनते हैं, इसी तरह महिलाओं को पुरुषों की वे तस्वीरें ज्यादा सुहाती हैं जिनमें लाल रंग की चौखट या फ्रेम हो।
लाल रंग को महिलाओं के प्रति पुरुषों का आकर्षण बढ़ाने वाला और खेल में अच्छे प्रदर्शन को बढ़ावा देने वाला रंग माना जाता है। समाचार पत्र 'टेलीग्राफ' में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में पहली बार यह सामने आया है कि महिलाओं को भी पुरुषों पर लाल रंग ही अच्छा लगता है।
अमेरिका के रोशेस्टर विश्वविद्यालय और जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एंड्रयू इलियट कहते हैं कि आमतौर पर लाल रंग को केवल महिलाओं के लिए आकर्षक रंग माना जाता है।
उन्होंने कहा कि उनका अध्ययन बताता है कि लाल और आकर्षण के बीच का संबंध पुरुषों को लुभाता है।
'जर्नल फॉर एक्सपेरीमेंटल साइकोलॉजी' में प्रकाशित हुए अध्ययन के लिए 25 पुरुषों और 32 महिलाओं को एक आदमी की श्वेत-श्याम तस्वीरें दिखाई गईं। इनमें से एक तस्वीर लाल पृष्ठभूमि में ली गई थी और दूसरी सफेद पृष्ठभूमि में। इसके बाद अध्ययन में शामिल लोगों से इन तस्वीरों के प्रति आकर्षण से संबंधित तीन प्रश्न पूछे गए थे।
महिलाओं ने आदमी की लाल रंग की फ्रेम से घिरी तस्वीर को ज्यादा आकर्षक बताया, जबकि पुरुषों के साथ ऐसा कुछ नहीं था।
एक अन्य प्रयोग में महिलाओं को एक आदमी की लाल और हरी पोशाक की तस्वीरें दिखाई गईं। इसमें भी महिलाओं को लाल पोशाक वाली तस्वीर ज्यादा आकर्षक लगी।
वैसे अलग-अलग संस्कृतियों में लाल रंग का मतलब अलग-अलग है, लेकिन सभी देशों की महिलाओं को लाल रंग के परिधानों में पुरुष ज्यादा आकर्षक लगते हैं।

Saturday, July 24, 2010

गर्भवती महिलाएं रोजाना पी सकती हैं 1 कप कॉफी


गर्भवती महिलाएं कॉफी का आनंद ले सकती हैं। अमेरिकी शोधकर्ताओं का कहना है कि हर रोज सुबह एक प्याला कॉफी लेने से गर्भवती महिलाओं के बच्चे पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
'मेल ऑनलाइन' के मुताबिक शोधकर्ता कहते हैं कि एक प्याला कॉफी में मौजूद 200 मिलीग्राम कैफीन से गर्भपात या अविकसित बच्चे के जन्म का खतरा नहीं होता।
पहले महिलाओं से गर्भावस्था के दौरान कॉफी न पीने के लिए कहा जाता था। इसकी वजह यह थी कि ऐसा माना जाता था कि इससे भ्रूण को नुकसान पहुंचता है और जन्म के समय बच्चे का वजन कम होता है।
'अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्सटीट्रिशियंस एंड गायनिकोलॉजिस्ट्स' द्वारा किए गए इस शोध में पूर्व के दो अध्ययनों का विश्लेषण किया गया था। इन अध्ययनों में 1,000 गर्भवती महिलाओं पर कॉफी सेवन का प्रभाव देखा गया था।
एक अध्ययन में पाया गया था कि अपनी गर्भावस्था की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान कॉफी की कम मात्रा लेने वाली महिलाओं में गर्भपात की दर नहीं बढ़ी थी।
जिन महिलाओं ने प्रतिदिन 200 मिलीग्राम कैफीन से ज्यादा कैफीन का सेवन किया उनमें गर्भपात का खतरा बढ़ा था।
वैसे वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि मां बनने वाली महिलाओं को एक दिन में दो प्याला से ज्यादा कॉफी नहीं पीना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात या अविकसित शिशु के जन्म का खतरा बढ़ जाता है।

बुजुर्गो के लिए 1-2 पैग है फायदेमंद


शराब का सेवन करने वाले बुजुर्गो के लिए शराब का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि रात का भोजन करने के बाद एक या दो पैग शराब का सेवन करने वाले बुजुर्गो में दिल की बीमारी, मधुमेह तथा मानसिक विकृति के खतरों को कम कर सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि एक या दो पैग लेने वाले बुजुर्गो की मृत्यु दर में 30 फीसदी की कमी हो सकती है। रात का भोजन करने के बाद शराब पीने का आनंद लेना अच्छा साबित हो सकता है क्योंकि शराब से भोजन जल्दी पच सकता है। ऐसे में इसका सेवन करने वाले अपने आपको काफी हल्का महसूस करेंगे।
स्थानीय समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक वेस्टर्न आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस प्रभाव को जानने के लिए 65 वर्ष से अधिक लगभग 25,000 लोगों पर यह प्रयोग किया।
अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान फोरम ऑन एल्कोहल रिसर्च से संबद्ध हेलेना कानीबियर ने कहा कि अधिकांश बुजुर्गो की मौत धमनियों के बंद हो जाने से होती है। धमनियों के बंद हो जाने से रक्त का प्रवाह कम हो जाता है। इस वजह से मानसिक विकृति, दिल की बीमारियां और कई तरह के दौरे पड़ने का खतरा बना रहता है।
हेलेना कहती हैं कि शराब रक्त को पतला बना देता है और धमनियों के सूजन को कम कर उन्हें खुला रखने में सहायता करता है। यह इंसुलिन बढ़ाने में मदद भी करता है जिससे मधुमेह होने का खतरा कम हो जाता है।

Friday, July 23, 2010

नवजात की देखभाल में उड़ा देती है नींद


नवजात की परवरिश 'बच्चों' का खेल नहीं। इसका खामियाजा माता-पिता को अपनी नींद को कुर्बान करके भुगतना पड़ता है।
एक शोध से पता चला है कि जन्म से दो वर्ष तक एक बच्चे की परवरिश के दौरान माता-पिता को अपनी छह महीने नींद गंवानी पड़ती है।
समाचार पत्र 'डेली टेलीग्राफ' के मुताबिक 1000 माता-पिता पर किए गए शोध ने यह साफ कर दिया है कि शुरुआती दो वर्षो में वे रात में सिर्फ चार घंटे की निर्बाध नींद ले पाते हैं।
वैसे नींद का एक पूरा चक्र पूरा करने के लिए कम से कम पांच घंटों तक सोने की जरूरत होती है, लेकिन नवजात की देखभाल के कारण माता-पिता को शुरुआती दो वर्षो तक औसतन एक घंटा कम सोने को मिलता है।
तीन में से दो माता-पिता ने माना कि उन्हें एक बार में सिर्फ तीन से सवा तीन घंटे की ही नींद मिल पाती है। कुछ तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने कहा कि वे सिर्फ ढाई घंटे सो पाते हैं।
ऐसे में माता-पिता को अपनी दिनचर्या को पटरी पर लाने के लिए क्या करना चाहिए। नींद के विशेषज्ञ इफ्तिखार मिर्जा का कहना है कि इस दौरान माता-पिता को पौष्टिक आहार लेना चाहिए जिससे कि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे।
साथ ही रोजाना कुछ समय तक व्यायाम करना चाहिए। इससे शरीर से एंड्रोफिन्स का निकास होता है। एंड्रोफिन्स को मनोभाव में तेजी से बदलाव आने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

Thursday, July 22, 2010

आधुनिक हो गया दादी-नानी का एजेंडा


गए वो दिन जब दादी नानी की परिभाषा झुकी कमर, सफेद बालों और चश्मा चढ़ी बुजुर्ग महिला की हुआ करती थी, जिसकी भूमिका नाती-पोतों को कहानी सुनाने तक सीमित थी। बदलते समय ने अब चुस्त तंदरूस्त दादी नानी के एजेंडे में आधुनिक तरीके से बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी डाल दी है।
कामकाजी अभिभावकों की व्यस्तता को देखते हुए दादी-नानी ने भी अपने सामने मौजूद चुनौतियों को स्वीकार कर मोर्चा संभाल लिया है।
करीब साल भर पहले तक कृषि विभाग में काम करने वाली ऊषा तैलंग अब अपनी पोती को सुबह तैयार कर, उसे स्कूल बस तक छोड़ने जाती हैं, दोपहर को उसे लेने जाती हैं, होमवर्क कराती हैं और उसके साथ वीडियो गेम भी खेलती हैं। वह बताती हैं कि रिटायर हो चुकी हूं और अब पोती की जिम्मेदारी संभाल रही हूं। मेरा बेटा और बहू दोनों ही नौकरी करते हैं। पोता सवा साल का है इसलिए अभी उसकी देखभाल में भागदौड़ नहीं करनी पड़ती।
मनोविज्ञानी विभा तन्ना कहती हैं कि बच्चों को दादी-नानी से गहरा लगाव होता है। यही बात उनके भविष्य को निखारने में बहुत उपयोगी साबित हो सकती है। अभिभावकों की गैर हाजिरी में दादी-नानी उनकी जितनी अच्छी तरह देखभाल करेंगी उतनी कोई नहीं कर सकता।
सात वर्षीय नाती को यूट्यूब पर कहानियां सुनाने में बिमला वाष्र्णेय को खूब मजा आता हैं। वह बताती हैं कि उसके चक्कर में मैंने कई कहानियां खोज डालीं। अब मजा भी आता है। नाती की खातिर मैंने कंप्यूटर चलाना और पित्जा, पास्ता, मैकरोनी बनाना सीखा।
बिमला कहती हैं कि अभी नाती की सर्वाधिक देखभाल की जरूरत है। उसके साथ दोस्ताना रिश्ता रखते हुए उसे नई-नई जानकारी देना जरूरी है। बच्चे अनगढ़ मिट्टी की तरह होते हैं, जैसा हम चाहें, उनका भविष्य गढ़ सकते हैं, लेकिन इसके लिए उनकी बातों में दिलचस्पी ले कर उनका विश्वास जीतना जरूरी होता है।
कुछ देशों में 23 जुलाई को 'गॉर्जियस ग्रैंडमा डे' मनाया जाता है जिसका कारण शायद दादी नानी की महत्वपूर्ण भूमिका ही है। भारत में ऐसे किसी दिन का चलन नहीं है, लेकिन संयुक्त परिवार की परंपरा होने के कारण घरों में दादी-नानी का खास महत्व है। आधुनिकता की मार ने ज्यादातर संयुक्त परिवारों की नींव हिला दी है, लेकिन नौकरीपेशा माता पिता के पास अपने बच्चों को दादी-नानी के हवाले करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।
विभा कहती हैं कि दादी-नानी से रिश्ता अटूट होता है जो बच्चों के मानसिक विकास में बहुत सहायक होता है। उनके पास उम्र का अनुभव भी होता है इसीलिए बच्चों की परवरिश में उनकी अहम भूमिका हो सकती है।
ऊषा कहती हैं कि पोती को नियमित होमवर्क कराते समय मैंने महसूस किया कि आज के बच्चों के लिए कितना कठिन समय आ गया है। हम लोगों ने अपने समय में प्रोजेक्ट, स्लाइड्स आदि के बारे में नहीं सुना था। आज तो बच्चों के साथ अगर बड़े न लगें तो उनका होमवर्क मुश्किल हो जाएगा।
वह कहती हैं कि मेरे बेटे बहू चाह कर भी इतना समय नहीं निकाल पाएंगे। ऐसे में मुझे ही हिम्मत करनी होगी। मैंने तो पोती का प्रोजेक्ट बनाने में उसकी काफी मदद की। साथ ही खुद भी सीख लिया।
विभा कहती हैं कि बदलते समय के साथ खुद को बदल कर दादी-नानी एक रोल मॉडल पेश कर रही हैं। यह जरूरी भी है, उनके लिए भी और बच्चों के लिए भी।

Friday, July 16, 2010

60 करोड़ वर्ष पुराना है मानव शुक्राणु का इतिहास


अमेरिकी वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव शुक्राणु का इतिहास 60 करोड़ वर्ष पुराना है। यह तथ्य सामने आने के बाद अब पुरुष गर्भनिरोधक सहित मनुष्य के स्वास्थ्य संबंधी मामलों में तमाम व्यावहारिक प्रयोग किए जा सकते हैं।
नार्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के एक दल ने पाया कि यौन संबंधी विशिष्ट जीन बाउले शुक्राणुओं के निर्माण के लिए जिम्मेदार है। यह जीन करीब करीब सभी जानवरों में पाया जाता है, लेकिन अभी तक इस जीन के विकास का पहलू अनछुआ ही रहा है।
शोध में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि बाउले ऐसा एकमात्र ज्ञात जीन है जिसकी कीट से लेकर स्तनधारियों तक में शुक्राणु के निर्माण के लिए विशेष आवश्यकता होती है।
अध्ययन करने वाले मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर इयूजीन जू ने बताया कि ऐसा पहली बार स्पष्ट सबूत मिला है कि हमारी शुक्राणुओं को निर्माण करने की क्षमता काफी प्राचीन है। शायद 60 करोड़ वर्ष पहले जानवरों के विकास की शुरुआत के समय में यह जीन सामने आया।
वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार संभावना है कि सभी जानवरों के शुक्राणुओं का निर्माण एक समान प्राथमिक अवस्था से हुआ।

Thursday, July 15, 2010

बढ़ रहा है कागज के गहनों का चलन


सोने की दिन पर दिन बढ़ती कीमत ने इस धातु को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है लेकिन गहनों की चाहत भला महंगाई से कब समझौता करती है। रिसाइकिल किए हुए कागज से बने गहने यह शौक पूरा कर रहे हैं और इनसे पर्यावरण को कोई नुकसान भी नहीं होता।
पेपर जूलरी डिजाइनर अनु सहरिया कहती हैं कि आदिकाल से ही महिलाएं गहनों की शौकीन रही हैं। गहने न केवल उनके सौंदर्य को अभिव्यक्ति देते हैं बल्कि उन्हें भीड़ में एक अलग पहचान भी देते हैं। इस अवधारणा में पेपर जूलरी कहीं से भी पीछे नहीं है। उनके डिजाइन में उतनी ही मेहनत लगती है जितनी मेहनत सोने या चांदी के गहनों को डिजाइन करने में लगती है।
उन्होंने बताया कि रिसाइकिल्ड कागज से बने कागज के जेवरात पानी के साथ तैयार किए जाते हैं। पर्यावरण अनुकूल होने के अलावा यह हल्के होते हैं और ज्यादा समय तक चलते हैं। कई लोगों की त्वचा संवेदनशील होती है और धातु से उन्हें एलर्जी या रिएक्शन की समस्या हो जाती है। पेपर जूलरी से ऐसा नहीं होता। उनका कहना है कि पानी के संपर्क के आने पर कागज के गहने खराब नहीं होते और न ही इन पर पसीने का दुष्प्रभाव पड़ता है।
पेपर जूलरी के डिजाइन से ही जुड़े शिवानी कोचर कहती हैं कि हम मिल में बने रिसाइकिल किए हुए कागज का इस्तेमाल करते हैं। इससे कार्बन घटता है और यह पर्यावरण के अनुकूल होता है।
अनु ने कहा कि पेपर जूलरी को कोई भी रंग और रूप दिया जा सकता है।
शिवानी और अनु दोनों ही कहती हैं कि किशोरियों, युवतियों और 35 साल तक की उम्र की महिलाओं को कागज के गहने खास तौर पर पसंद आते हैं। इसका मुख्य कारण इसकी कम कीमत और डिजाइनों की विविधता है।
शिवानी के अनुसार, धातु के गहनों की तुलना में कागज के गहनों की कीमत बहुत कम होती है। कुछ समय तक इस्तेमाल के बाद इन्हें फेंका जा सकता है।
अनु बताती हैं कि कागज के गहने बनाने के लिए पहले रॉ मटीरियल तैयार किया जाता है। फिर इसे हाथ से विभिन्न आकृतियों और आकारों में ढाला जाता है। इसे जोड़ने, मजबूत और सख्त करने, रंग करने और वाटर प्रूफ बनाने में काफी सावधानी बरती जाती है।
उन्होंने कहा कि पेपर जूलरी में क्रिस्टल, स्टोन, कुंदन, ग्लास बीड्स, पोल्की, सेमी पे्रशियस स्टोन्स आदि का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात यह है कि कागज के गहने बनाने में रसायनों का उपयोग नहीं के बराबर होता है।
शिवानी बदलते मौसम और मूड के अनुरूप, कागज के गहने तैयार करती हैं। वह कहती हैं कि विदेशों में भी कागज के गहने बहुत पसंद किए जा रहे हैं।

Wednesday, July 14, 2010

हेयर स्टाइल बदलने में माहिर हैं महिलाएं


यदि आप अपनी पत्नी, बहन, बेटी या मित्र की जल्दी-जल्दी बदलती 'हेयर स्टाइल' देखकर तंग आ गए हैं तो आपको बता दें कि एक नया तथ्य सामने आया है। ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक एक महिला अपने जीवन में औसतन 104 बार 'हेयर स्टाइल' बदलती है।
समाचार पत्र 'डेली मेल' के अनुसार महिलाएं 13 से 65 वर्ष की उम्र में कई बार 'हेयर स्टाइल' बदलती हैं। वे साल में कम से कम दो बार बालों की लेयरिंग कराती हैं और बालों को रंगती भी हैं। यही नहीं वे अपने बालों को छोटा भी कराती हैं।
सर्वेक्षण करने वाले हेयरड्रेसर एंड्रयू कोलिंग के मुताबिक ज्यादातर महिलाएं सालभर में अपने बालों के कम से कम तीन बार रंग बदलने की कोशिश करती हैं। इनमें गहरा भूरा रंग [डार्क ब्राउन] सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। अधिकतर देखा जाता है कि दो तिहाई महिलाएं कम से कम एक बार अलग दिखने की कोशिश करती हैं।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं के हेयरड्रेसर उनके पुराने 'हेयर स्टाइल' को बोरियत बताते हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण बदलते हुए रिश्ते हैं। महिलाएं नए रिश्ते के साथ नए रूप में दिखना चाहती हैं।
यह सर्वेक्षण 3,000 महिलाओं पर किया गया। जिसमें पाया गया कि 44 फीसदी महिलाएं बोरियत की वजह से बाल के रंग या 'हेयर स्टाइल' बदलती हैं, जबकि 61 फीसदी ने कहा कि वह अपने में बदलाव देखना चाहती हैं।

Tuesday, July 13, 2010

हर पांचवां साथी बेवफा !


आज के दौर में हर पांच में से एक शख्स अपने साथी के प्रति ईमानदार नहीं होता है। एक ताजा अध्ययन की माने तो हर पांचवें व्यक्ति का दिल अपने साथी के लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए धड़कता है। यही नहीं, बेवफाई के मामले में पुरुष महिलाओं से आगे हैं।
स्थानीय समाचार पत्र 'डेली मेल' के अनुसार इस अध्ययन में 3,000 लोगों की राय ली गई। इनमें से 50 फीसदी ने कहा कि वे अपनी साथी के प्रति ईमानदार हैं। आधे लोगों ने पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया कि उनका झुकाव किसी और के लिए भी है।
प्रत्येक छह में से एक की राय थी कि वह किसी और के साथ मेलजोल और संबंध बनाने की चाहत रखते हैं। अध्ययन में ज्यादातर लोगों ने यह माना कि किसी और के लिए पैदा हुए अहसासों पर काबू कर पाना संभव है। इस अध्ययन में शामिल एक शख्स ने बताया कि अपने मौजूदा रिश्तों से खुश लोग भी न चाहते हुए किसी और का अहसास कर लेते है। इस तरह के अहसास तीन महीने से लेकर तीन साल तक जिंदा रहते हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि जो लोग अपने अहसासों पर काबू नहीं रख पाते वे अक्सर किसी और संबंध में पड़ जाते हैं जिससे उनका विवाह या मौजूदा रिश्ता टूट जाता है।
इस अध्ययन के दौरान 25 लोगों में से एक ने माना कि उनका अपने साथी के अलावा किसी और से संबंध पांच वर्ष से भी अधिक समय तक चला। किसी और से संबंध स्थापित करने का चलन पुरुषों में ज्यादा है। 22 फीसदी पुरुषों ने माना कि उनका एक बार में दो से ज्यादा महिलाओं के साथ संबंध रहा है।
महिलओं में यह प्रवृति कम देखी गई। 15 फीसदी महिलाओं ने माना कि उनका अपने साथी के अलावा किसी और भी संबंध रहा है। 29 फीसदी पुरुषों ने माना कि उन्होंने दूसरी महिला के लिए अपनी साथी को छोड़ने का विचार किया था। ऐसी राय रखने वाली महिलाओं की संख्या 19 फीसदी रही।

Friday, July 9, 2010

एक मोर है नमाज और समय का पाबंद !


उत्तर प्रदेश के एक गांव की मस्जिद में आने वाला एक नमाजी थोड़ा खास है। यह कोई इंसान नहीं, बल्कि मोर है। यह अनोखा 'नमाजी' नमाज के वक्त मस्जिद में जाकर मनमोहक तरीके से नाचता है।
बुलंदशहर के बोकरासी गांव स्थित इस इकलौती मस्जिद का यह अद्भुत नमाजी आकर्षण का केंद्र बन गया है। अल्लाह के प्रति मोर के इस अटूट जुड़ाव को देखकर स्थानीय लोग उसे प्यार से ऊपर वाले का परिंदा कहकर बुलाते हैं।
मस्जिद के मौलाना रहमान कहते हैं कि नमाज का समय शुरू होने से पहले मोर मस्जिद की दीवार पर आकर बैठ जाता है और जैसे ही नमाज शुरू होती है, वह मस्जिद के अहाते में आकर नाचने लगता है।
ग्रामीणों के मुताबिक विगत दो वर्षो से वे नमाज के समय इस मोर को नाचते हुए देख रहे हैं। स्थानीय निवासी बाबर खान कहते हैं कि मोर समय का बहुत पाबंद है। खासकर शाम को अता की जाने वाली अजान की नमाज शुरू होने से पहले वह चबूतरे पर आकर बैठ जाता है और मस्जिद आने वाले नमाजियों का घूम-घूमकर इस्तकबाल करता है। जैसे ही अजान की नमाज शुरू होती है, वह मनमोहन ढंग से नाचना शुरू कर देता है। यह कभी न भूलने वाले लम्हे जैसा होता है।
उन्होंने कहा कि शुरुआत में तो मोर के इस व्यवहार से हम सब हतप्रभ थे, लेकिन अब नमाज के दौरान मोर का नाचना आम बात हो गई है।
ग्रामीणों का कहना कि करीब चार माह पहले यह मोर गांव में पहली बार दिखा था। शुरुआत में गांव के कुछ लोग उसे खाना खिलाते थे। धीरे-धीरे वह सबका चहेता बन गया।
मौलाना कहते हैं कि करीब दो साल पहले एक दिन मोर नमाजियों के पीछे-पीछे मस्जिद परिसर आया था। उसके बाद वह लगातार नमाज के वक्त नियिमत रूप से आने लगा।

Tuesday, July 6, 2010

रिश्तों में गर्माहट लाती है एक साथ सैर


दो पीढि़यों के बीच संवादहीनता या कंयुनिकेशन गैप हमेशा से परिवारों के लिए एक समस्या बनता आया है। इस समस्या को कुछ छोटे-छोटे उपाय करके सुलझाया जा सकता है, जिनमें से एक उपाय है, साथ में सैर करना। समाज से जुड़े कई अध्ययन बताते हैं कि परिवार के सदस्यों के बीच सार्थक बातचीत जीवन में सफलता लाने में अहम भूमिका निभाती है।
पिता और पुत्री के रिश्तों में और गर्माहट लाने के लिए ब्रिटेन में मनाया जाने वाला यह दिवस अब परिवार के सभी सदस्यों के बीच का संवाद कायम करने का प्रतीक बनता जा रहा है। परिवार के सदस्य इस दिन साथ में सैर पर जाते हैं।
फिल्म अभिनेत्री और निर्देशिका पूजा भट्ट कई साक्षात्कारों में इस बात को स्वीकार करती हैं कि उन्हें न केवल कहीं जाने के लिए, बल्कि सैर के लिए भी अपने पिता महेश भट्ट का साथ चाहिए।
समाज शास्त्री अलका आर्य बताती हैं कि परिवार के सदस्यों का साथ में घूमना या सैर पर जाना उनके बीच संवादहीनता जैसी समस्याओं को खत्म करने में मददगार साबित हो सकता है।
अलका कहती हैं कि कहीं भी सैर पर जाना हो, तो कोशिश यही की जानी चाहिए कि पूरा परिवार ही एक साथ जाए, लेकिन आजकल की व्यस्त दिनचर्या में ऐसा नहीं हो पाता। यही कारण है कि रिश्तों में दूरियां और संवादहीनता जैसी समस्याओं ने समाज में पैठ बना ली है। रिश्तों की इन गांठों को खोलने के लिए साथ में सैर करना अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।
वहीं मनोवैज्ञानिक इसके पीछे एक मनोविज्ञान के काम करने का तर्क देते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. अरूण रसगांवकर का मानना है कि सैर के दौरान दिमाग में किसी तरह का तनाव नहीं होता और इसलिए यह समय आपस में बातचीत कर रिश्तों की गुत्थियां सुलझाने और शिकवे-शिकायत दूर करने के लिए उपयुक्त होता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ओकलाहोमा ने भी अपने एक शोध में इस बात को प्रमाणित किया है कि वे बच्चे अपने माता-पिता के ज्यादा करीबी होते हैं, जो उनके साथ सप्ताह में कम से कम एक बार लांग वॉक पर जाते हैं।
मुख्य शोधकर्ता डॉ. यांग क्सी झू ने अपने शोध में कहा था कि लगभग 739 युवाओं पर किए शोध से पता चलता है कि ऐसे बच्चे जो अपने अभिभावकों के साथ सैर पर जाते हैं, उनके ज्यादा करीबी होते हैं। ऐसे बच्चों में अपने माता-पिता से बातें शेयर करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

Friday, July 2, 2010

पोषक तत्वों का भंडार है फलियां


मौसम कोई भी हो, सब्जियों के बाजार में किसी न किसी प्रकार की फली हर समय दिखाई देती है। प्राकृतिक गुणों से भरपूर अलग-अलग प्रकार की ये फलियां न केवल सब्जी के तौर पर खाने में स्वादिष्ट होती हैं, बल्कि शरीर को डायबिटीज और हृदय रोगों से बचाने के अलावा वजन कम करने में भी मददगार साबित होती हैं।
केंटुकी विश्वविद्यालय में हुए एक शोध में कहा गया है कि फलियां रक्त से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाती हैं, जिससे शरीर का मोटापा कम होता है।
शोध के मुताबिक फलियों में पर्याप्त मात्रा में फाइबर मौजूद होते हैं, जो पाचन तंत्र से गुजरने के दौरान अतिरिक्त पित्त को अपशोषित कर लेते हैं और उसे शरीर में अवशोषित होने से पहले ही उसे बाहर निकाल देते हैं।
शोध में प्रमाणित हुआ है कि रोजाना कम से कम एक कप फलियों के सेवन से छह सप्ताह में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 10 फीसदी तक कम किया जा सकता है, जो हृदय रोग के खतरे को 40 फीसदी तक कम करता है। इसीलिए चिकित्सक हृदय रोगों के शिकार लोगों में फलियों के सेवन को जरूरी बताते हैं।
फिजीशियन डॉ. अजीत त्रिवेदी डायबिटीज से पीडि़त लोगों को भी नियमित तौर पर फलियों के सेवन की सलाह देते हैं। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि फलियों में रेशे घुले होते हैं, जो इंसुलिन रिसेप्टर साइट्स को सक्रिय बनाने में मदद करते हैं। इन साइटों के माध्यम से ही इंसुलिन कोशिकाओं में जाता है। डायबिटीज से पीडि़त लोगों में हृदय रोगों का खतरा भी काफी होता है, इस तरह से फलियां दोनों समस्याओं को दूर करने में मदद करती हैं।
चिकित्सक इस बात पर भी जोर देते हैं कि बढ़ते बच्चों के भोजन में फलियों को जरूर शामिल किया जाना चाहिए।
इंडियाना विश्वविद्यालय में हुए एक शोध में कहा गया है कि फलियां विटामिन बी समूह, कैल्शियम, पोटेशियम और फोलेट से समृद्ध होती हैं।
शोध के मुताबिक फलियों में मौजूद विटामिन बी मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं को स्वस्थ रखने, त्वचा रोगों को दूर करने और पाचन तंत्र को दुरूस्त रखने में मदद करता है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मानसी जोशी बताती हैं कि बच्चों की हड्डियां और दांत मजबूत रखने के लिए उन्हें फलियों का सेवन कराना चाहिए।
डॉ. मानसी ने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों को बीन्स को अंकुरित करके खिलाने से यह उनके शरीर में बहुत जल्दी अवशोषित होती हैं और उनके पाचन तंत्र की गतिविधियां सुचारू तौर पर चलती हैं।

Sunday, June 27, 2010

अब पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोली...


परिवार नियोजन की जिम्मेदारी अब केवल महिलाओं के कंधों पर नहीं रहेगी। वैज्ञानिकों ने महिलाओं के गर्भनिरोधक के विकल्प के रूप में पुरुषों के लिए ऐसी ही एक गर्भनिरोधक गोली विकसित करने का दावा किया है।
अभी तक पुरुषों के लिए यह गोली विकसित करने के सभी प्रयास विफल रहे थे और वैज्ञानिक पुरुषों के लिए एक हार्मोन आधारित गर्भनिरोधक गोली तैयार करने में जुटे थे जिसे डाक्टर की सलाह पर लिया जा सके।
हालांकि इस गोली का सेवन करने वालों ने इसके इस्तेमाल से अवसाद और यौनच्इच्छा में कमी जैसे दुष्प्रभावों की शिकायत की थी।
अब इजरायली वैज्ञानिकों की एक टीम ने शुक्राणुओं की जैव रसायन मशीनरी को अवरूद्ध कर एक गोली बनाई है। वास्तव में इसमें यह फार्मूला अपनाया गया है जिसके तहत शुक्राणुओं के उन महत्वपूर्ण प्रोटीन को हटा दिया गया है जो किसी महिला के गर्भधारण करने के लिए जरूरी होते हैं। डेली एक्सप्रेस में यह जानकारी दी गई है।
गोली बनाने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गोली तीन महीने में केवल एक बार लेनी होगी और यह गर्भ धारण होने से रोकने में सौ फीसदी प्रभावी है और इसका कोई दुष्प्रभाव नहंी है।
बार एलन यूनिवर्सिटी के प्रमुख वैज्ञानिक हैइम ब्रेटबर्ट के हवाले से ब्रिटिश टेबलायड ने लिखा है कि जो गोली हम विकसित कर रहे हैं, यह पुरुषों को यौन आनंद देती है और वह भी बिना किसी परिणाम के।
सर्वेक्षणों में पाया गया था कि यदि हर रोज गर्भनिरोधक गोली लेनी हो तो वे महिलाएं परिवार नियोजन की जिम्मेदारी देने के मामले में पुरुषों पर भरोसा नहीं करेंगी, लेकिन प्रोफेसर ब्रेटबर्ट ने साथ ही कहा कि मैं समझता हूं कि अधिकतर महिलाएं महीने में एक बार या तीन महीने में एक बार गोली लेने के मामले में अपने साथी पुरुष पर भरोसा करेंगी।

Friday, June 25, 2010

रेड वाइन से ठीक रहती है आंख


रेड वाइन अगर सीमित मात्रा में पी जाए तो इसके कई फायदे हैं। भारतीय मूल के शोधकर्ता ने फायदों की सूची में एक नई बात को जोड़ते हुए कहा है कि रेड वाइन के सेवन से आंख की रोशनी बरकरार रहती है।
डा. राजेन्द्र आप्टे के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने यह पाया कि अंगूर और इसके जैसे अन्य फलों के रस जिससे कि रेड वाइन का निर्माण होता है, में वे तत्व मौजूद होते है जिससे आंखों की कोशिकाओं में पाए जाने वाले रक्त की नलिकाओं में बढती उम्र के कारण होने वाली क्षति को भरने की क्षमता होती है।
द डेली टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार इसमें रेसविरेट्राल नाम का यौगिक पाया जाता है जो बढ़ती उम्र में होने वाले कोशिकाओं के नुकसान को रोककर आंखों की रोशनी को बढ़ाता है।
यह यौगिक उम्र को घटाने में [एंटी ऐजिंग] और कैंसर से लड़ने के लिए उपयुक्त होता है और यह माना जाता है कि यह क्षतिग्रस्त रक्त कोशिकाएं और उत्परिवर्तित [म्यूटेशन नाम की क्रिया जो कोशिकाओं की संरचना को परिवर्तित कर देती है] कोशिकाओं को ठीक करने में मदद करता है।
उत्परिवर्तन और बढ़ती उम्र के कारण कैंसर, हृदय रोग और अंाखों से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। डा. आप्टे ने कहा कि यह अध्ययन एक व्यापक प्रभाव को पैदा करेगा जिससे हमें यह जानने में मदद मिलेगी कि रेसविरेट्राल हार्मोन कैसे काम करता है और यह किस प्रकार से आंखों के अंदर और बाहर की कोशिकाओं से जुड़कर उसे प्रभावित करता है।
रेसविरेट्राल एक प्रकार का प्राकृतिक यौगिक है जो कई पौधों में जीवाणु और कवक से होने वाले संक्रमण से बचने के लिए निकलता है। यह अंगूर में भारी मात्रा में पाया जाता है।
इससे पहले के शोध में इस बात को प्रमाणित किया जा चुका है कि रेसविरेट्राल हार्मोन एंटी एजिंग और कैंसर प्रतिरोधी क्षमता को विकसित करता है।
यह शोध 'द अमेरिकन जर्नल आफ पैथोलाजी' में प्रकाशित हुआ है।

जम्हाई लेना 'यौन आकर्षण का संकेत'


अगली बार यदि आप दूसरों के सामने जम्हाई लेते हैं तो जरा सावधान रहिए। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जम्हाई या उबासी लेना यौन आकर्षण का संकेत है। अब तक माना जाता था कि यह सोने की इच्छा के प्रकटीकरण का माध्यम है।
पेरिस में आयोजित पहले अंतरराष्ट्रीय जम्हाई सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने दावा किया कि इंसान की यह क्रिया वास्तव में रुचि, दबाव और यहां तक कि सेक्स की चाहत सहित अन्य भावनाओं को प्रकट कर सकती है।
'द टेलीग्राफ' की खबर के अनुसार वैज्ञानिक हालांकि अब तक जम्हाई लेने की उस प्रक्रिया के बीच अंतर स्पष्ट नहीं कर पाए जो कामोत्तेजना या कुछ नींद लेने की आवश्यकता को प्रकट करती है।
इस तथ्य के बावजूद कि औसतन हर आदमी अपने जीवनकाल में दो लाख 40 हजार बार उबासी लेता है, इस प्रक्रिया के बारे में अधिकांशत: रहस्य ही बना हुआ है।
वैज्ञानिक अब तक इस बारे में सही-सही नहीं जानते कि हम जम्हाई क्यों लेते हैं, लेकिन इससे अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलने की प्रचलित सोच पूरी तरह गलत है।
जम्हाई विज्ञान के विशेषज्ञ माने जाने वाले डच शिक्षाविद वोल्टर स्यूंटजेंस के हवाले से अखबार ने कहा कि हम आदमी को चांद पर भेज सकते हैं, लेकिन हम इन गतिविधियों की मामूली सी भी व्याख्या नहीं कर सकते।
उबासी से कामुकता की धारणा तब पैदा हुई जब स्यूंटजेंस ने यह उल्लेख किया कि बहुत से ऐसे लोगों ने सेक्स विशेषज्ञों से संपर्क किया जिन्होंने सेक्स या यौन संबंधों से पूर्व की क्रिया के दौरान जम्हाई ली।

Wednesday, June 23, 2010

महिलाओं की प्रजनन प्रणाली में होती है गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था


महिलाओं की प्रजनन प्रणाली में स्वत: ही गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था होती है जो ऐसे शुक्राणुओं को खारिज कर देती है जिन्हें वह गर्भ धारण करने के लिए अच्छा नहीं पाती।
यूनिवर्सिटी आफ ऐडिलेड की साराह राब‌र्ट्सन के हवाले से एबीसी ने बताया है कि परीक्षणों में पाया गया कि महिलाओं की प्रजनन प्रणाली के भीतर ही कुछ ऐसी व्यवस्था होती है जो यह अनुमान लगाती है कि साथी पुरूष क्या इतना गुणवान है कि उसका गर्भ धारणा किया जाए। उन्होंने बताया कि पूरी प्रक्रिया यह बताती है कि महिला का शरीर खुद इस बात का मूल्यांकन करता है कि क्या गर्भ धारण करने का सही समय आ गया है या कि मौजूदा पुरूष साथी गर्भ धारण करने के लिए सही है?
साराह ने बताया कि कुछ महिलाओं में यह प्रणाली अधिक सक्रिय होती है। ऐसा हो सकता है कि किसी एक साथी के साथ उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो। हमें जो कुछ समझ में आया है, वह यह कि गर्भधारण करने की महिलाओं की प्रजनन व्यवस्था में साथी एक महत्वपूर्ण कारक है।
शोधकार्य की अगुवा साराह ने कहा कि कुछ महिलाओं और पुरूषों की जोड़ी सही नहीं होने पर भी ऐसा होता है। यह भी संभव है कि कुछ महिलाओं की प्रतिरोधक प्रणाली साथी पुरूष के शुक्राणुओं के प्रति सही प्रतिक्रिया नहीं दे रही हो।
इस शोध के शुरूआत में चूहों और सुअरों को शामिल किया गया था, लेकिन साराह ने कहा कि ऐसे संकेत हैं कि इंसानी महिलाओं में भी यही प्रक्रिया काम करती है।

Tuesday, June 22, 2010

21वीं सदी में भी विधवाएं हैं उपेक्षा की शिकार


रमा देवी को समझ नहीं आता कि एक दिन जिस परिवार ने उन्हें पूरे प्यार और सम्मान से अपनाया था वही परिवार आज उन्हें मनहूस क्यों मानता है और शादी-ब्याह, मुंडन जैसे शुभ अवसरों पर उन्हें शामिल क्यों नहीं किया जाता।
पश्चिमी दिल्ली के एक गांव की 72 वर्षीय रमा देवी पति के लिए पति के निधन के सदमे से उबर पाना बहुत मुश्किल था और उनकी मुश्किलें उस वक्त और बढ़ गईं, जब उनका अपना परिवार उन्हें मनहूस मानने लगा। उपेक्षा की इस मार ने उनकी पीड़ा को कई गुना बढ़ा दिया।
शिक्षा के प्रसार और आधुनिकता की बयार के बावजूद 21वीं सदी में भी विधवाओं को अशुभ माना जाता है। लोग उन्हें न केवल शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर ही दूर नहीं रखते हैं, बल्कि उन्हें परिवार पर बोझ मानते हैं।
हालांकि विधवाओं को भी संपत्ति में हिस्सा पाने का कानूनी हक है, लेकिन व्यवहार में ऐसा बहुत कम होता है और उन्हें संपत्ति के हक से बेदखल कर दिया जाता है। खासकर जब पति के भाइयों में जमीन या संपत्ति के लिए विवाद होता है तो विधवा के हक को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
एक अनुमान के अनुसार देश में तीन करोड़ 30 लाख विधवाएं हैं। देश में हर चौथे परिवार में एक विधवा हैं और देश की इतनी बड़ी आबादी को अपनेपन के अभाव में घोर उपेक्षा में अपने जीवन के दिन काटने पड़ रहे हैं।
देश में विधवाओं खासकर वृद्ध विधवाओं को गरीबी, भूखमरी, खराब स्वास्थ्य देखभाल, ज्यादा शारीरिक श्रम जैसी समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में करीब 45 प्रतिशत वृद्ध विधवाएं जटिल स्वास्थ्य समस्याओं से घिरी हैं।
विधवाओं में करीब आधी कम उम्र की विधवाएं हैं जो बालपन में ही अधिक उम्र के पुरूष से ब्याह दिए जाने के कारण वैध्वय का शिकार हो जाती हैं।
देश में भले ही ब्रिटिश काल में ही सती प्रथा समाप्त हो गई और विधवा पुनर्विवाह कानून भी बन गया, लेकिन हकीकत यह है कि कई सवर्ण जातियों में विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता। उन्हें सादगी के नाम पर ताउम्र जीवन के रंगों से दूर रहना पड़ता है। सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इन्हें इनके पति की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।
कई परिवार विधवाओं को मोक्ष के नाम पर वृंदावन या बनारस की तंग गलियों में छोड़ आते हैं, लेकिन दरअसल ऐसा उनसे पिंड छुड़ाने के लिए किया जाता है। वहां उन्हें जीवन की जरूरतें पूरी करने के लिए भीख तक मांगना पड़ता है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मोहिनी गिरी मानती हैं कि बाल विवाह की वजह से महिलाएं बड़ी संख्या में विधवा हो जाती हैं। कुछ पुरातन परंपराओं कारण विधवाओं का दूसरा विवाह नहीं किया जाता और उनसे पिंड छुड़ाने के लिए उन्हें किसी धार्मिक शहर में छोड़ दिया जाता है।
एक अनुमान के अनुसार वृंदावन में करीब 15 हजार विधवाएं हैं। इसी तरह बनारस में बहुत बड़ी संख्या में विधवाएं हैं। वहां उन्हें समुचित खाना पीना नहीं मिलता और कई बार उनका यौनशोषण होता है। कई महिलाओं को जीवन की जरूरतें पूरी करने के लिए लाचार होकर यौनधंधे में उतरना पड़ता है। विधवाओं की स्थिति पर दीपा मेहता की फिल्म 'वाटर' बहुत चर्चित रही।

Sunday, June 20, 2010

अब झूठे बहाने बनाने में मदद करेगा आपका मोबाइल



अगर आप अपने बॉस या किसी दोस्त के साथ बैठे हैं और उनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसके लिए आपको बस एक झूठ बोलना है और इस झूठ में मोबाइल आपकी मदद करेगा।एक मोबाइल कंपनी के कुछ हैंडसेटों में 'फेक कॉल' [फर्जी कॉल] नाम से एक सेवा शुरू की गई है जिसकी मदद से आप आसानी से झूठा बहाना बना सकते हैं।


मान लीजिए, आपकी किसी व्यक्ति के साथ मीटिंग है और आप चाहते हैं कि यह मीटिंग ज्यादा देर तक नहीं चले तो आप इस 'फेक कॉल' को चुपचाप एक्टीवेट कर सकते हैं। एक्टीवेट होने के कुछ देर में ही आपका मोबाइल बजने लगेगा और वहां मौजूद व्यक्तियों को लगेगा कि आपके पास किसी का फोन आया है।


आप इस फर्जी कॉल के जरिए लोगों से कह सकते हैं कि आपको जरूरी काम से जाना है। खास बात यह है कि यह कॉल बिना काटे असीमित समय तक जारी रह सकती है।


इस मोबाइल कंपनी के तकनीकी विभाग के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि 'फेक कॉल' की इस सुविधा से लोगों को अनचाहे व्यक्ति के साथ बातचीत से बचने में मदद मिलेगी। इस अधिकारी ने बताया कि 'फेक कॉल' की सुविधा का प्रयोग आप किसी से बचने के लिए कर सकते हैं। एक्टीवेट होने के बाद कुछ पलों में ही आपका मोबाइल बजने लगेगा। लोगों को लगेगा कि किसी का फोन आया है और आप कोई बहाना बनाकर वहां से निकल सकते हैं।


इस सुविधा के तहत अगर आपने पहले से अपनी या किसी और की आवाज मोबाइल में सेव कर रखी है तो 'फेक कॉल' के दौरान वही आवाज आपको कॉल के दौरान सुनाई देगी। आप अधिकतम 10 सेकेंड पहले से इस सुविधा को एक्टीवेट कर सकते हैं।वैसे अगर आप पहले से 'फेक कॉल' एक्टीवेट करना भूल गए और आप किसी से बात करते समय चाहते हैं कि आपके मोबाइल पर यह फर्जी काल आए तो यह भी संभव है। इसके लिए आपको चुपचाप जेब में हाथ डालकर इस हैंडसेट के दो बटन दबाने होंगे जिसके बाद पल भर में ही आपका मोबाइल बज उठेगा।

Thursday, June 17, 2010

पुरुषों के शुक्राणु विकास के लिए कौन है जिम्मेवार


वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसे लक्षणों की पहचान का दावा किया है जो बढ़ती उम्र के कुछ पुरुषों में महिलाओं की ही तरह प्रजनन क्षमता के ह्रास अथवा रजोनिवृत्ति के लिए जिम्मेदार होते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार पुरुषों और महिलाओं की रजोनिवृत्ति में मुख्य अंतर यह है कि महिलाओं में जहां सभी को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है वहीं पुरुषों में अधिक उम्र के केवल दो प्रतिशत पुरुष ही इससे दो चार होते हैं, जिसे आम तौर पर खराब स्वास्थ्य और मोटापे से जोड़कर देखा जाता है।
मैनचेस्टर विवि और लंदन के इंपीरियल कालेज और लंदन विश्वविद्यालय के दल ने आठ यूरोपीय देशों से नमूने एकत्र कर इस प्रयोग को अंजाम दिया। इसमें उन्होंने 40 से 79 साल के पुरुषों में टेस्टोरान [मेल सेक्स हार्मोन जो शुक्राणु बनने और प्रजनन के लिए उतरदाई होता है] के स्तर का अध्ययन कर उक्त निष्कर्ष निकाला।
वैज्ञानिकों के दल ने लोगों से उनके शारीरिक, भौतिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और उससे जुड़े कुछ सवाल पूछे और पाया कि 32 लोगों में से केवल नौ लोगों में उक्त लक्षण टेस्टोरान का स्तर सामान्य से कम होने की वजह से थे। इनमें तीन यौन लक्षण सबसे महत्वपूर्ण रहे।
पहला सुबह के समय कामोत्तेजना में कमी, दूसरा यौन विचारों में कमी और तीसरा उत्थानशीलता में कमी शामिल
दल ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि किसी पुरुष में यौन प्रवृतियों के यह तीन लक्षण और टेस्टोरान हार्मोन के स्तर में कमी पाई जाए तो इसका मतलब है कि उक्त पुरुष रजोनिवृत्ति की प्रक्रिया से गुजर रहा है, लेकिन उस व्यक्ति में इसके अलावा कुछ गैर यौन लक्षण भी पाए जा सकते हैं।
इसमें उन्होंने तीन शारीरिक लक्षणों को चिन्हित किया, जिसमें दौड़ने या वजन उठाने जैसे भारी काम कर पाने में अक्षमता, एक किमी से अधिक की दूरी तक न चल पाना और झुकने और बैठने में परेशानी होना शामिल है। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक तौर पर जो लक्षण सामने आए उनमें, ऊर्जा की कमी, उदासी और कमजोरी शामिल हैं।
यह शोध लंदन की शोध पत्रिका न्यू इंगलैंड जर्नल आफ मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।

Wednesday, June 16, 2010

यहां पर लगती है अमर-प्रेम फरियाद


भारत-पाकिस्तान की सरहद पर बिंजौर गांव में एक मजार पर दिन ढलते ही कव्वाली की धुनों के बीच सैकड़ों युगल अपने प्रेम के अमर होने की दुआ मांगते देखे जा सकते हैं। यहां हर साल एक मेला लगता है जिसमें आने वालों को पूरा यकीन है कि उनकी फरियाद जरूर कुबूल होगी।
लैला-मजनू की दास्तान पीढि़यों से सुनी और सुनाई जा रही है। कहा जाता है कि लैला और मजनू एक दूजे से बेपनाह मोहब्बत करते थे, लेकिन उन्हें जबरन जुदा कर दिया गया था। यहां के लोग इस मजार को लैला-मजनू की मजार कहते हैं। हर साल 15 जून को यहां सैकड़ों की तादाद में लोग पहुंचते हैं, क्योंकि यहां इस दौरान मेला लगता है।
यह मजार राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में है। पाकिस्तान की सीमा से यह महज दो किलोमीटर की दूरी पर है। इस साल भी यहां सैकड़ों की संख्या में विवाहित और प्रेमी जोड़े यहां पहुंचे। इस बार मेला मंगलवार को आरंभ हुआ और बुधवार तक चला।
यद्यपि इतिहासकार लैला-मजनू के अस्तित्व से इंकार करते हैं। वे इन दोनों को काल्पनिक चरित्र करार देते हैं। परंतु इस मजार पर आने वालों को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे तो बस फरियाद लिए यहां चले आते हैं।
स्थानीय निवासी गौरव कालरा कहते हैं कि हर साल यहां सैकड़ों जोड़े लैला-मजनू का अशीर्वाद लेने आते हैं। मैं नहीं जानता कि लैला-मजनू थे या नहीं, लेकिन पिछले 10-15 वर्षो में यहां आने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है।
यहां आने वाले सभी मजहबों के लोग होते हैं। कालरा ने बताया कि सिर्फ हिंदू और मुसलमान ही नहीं बल्कि सिख एवं ईसाई भी इस मेले में आते हैं।
नवविवाहिता युवती रेखा ने कहा कि हमने सुना है कि यह प्रेम करने वालों का मक्का है और यहां खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के लिए यहां एक बार जरूर आना चाहिए। इसलिए मैं भी अपने पति के साथ यहां आई हूं।
इस मजार की लोकप्रियता और उत्सुकता को देखते हुए सरकार इस गांव में सुविधाएं बढ़ाने पर विचार कर रही है।

Sunday, June 6, 2010

...अब आ गई सिगरेट छुड़ाने वाली मशीन


काफी जद्दोजहद के बाद भी अगर आप सिगरेट छोड़ने में नाकाम रहे हैं तो घबड़ाने की कोई बात नहीं, क्योंकि दिल्ली के दो सरकारी अस्पतालों और इनके तंबाकू से निजात दिलाने वाली क्लिनिकों में कंपनयुक्त एक्यूप्रेशर तकनीकी की जल्द ही शुरुआत हो सकती है।
जर्मन निर्मित बायो-रेसोरेंस [कंपन चिकित्सा] उपकरण, शरीर के अंदर के विद्युतीय तरंगों के साथ मिल कर आपमें निकोटीन लेने की च्च्छा को कम करता है।
राज्य सरकार द्वारा संचालित इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहैवियर एंड अलाइड साइंस के निदेशक डाक्टर नीमेश देसाई ने बताया कि बायो रेसोरेंस यंत्र पहली सिगरेट पीने के बाद आपमें अगली सिगरेट पीने कीच्इच्छा को समाप्त कर देता है। सिगरेट छुड़ाने का यह उपचार न तो नुकसानदायक है और न ही पीड़ादायक है। इस चिकित्सा पद्धति में किसी प्रकार की कोई दवा भी नहीं लेनी पड़ती।
सिगरेट पीने कीच्इच्छा रखने का केवल मानसिक संबंध नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ जैविक कारण भी हैं।
देसाई ने बताया कि आप के हाथ में बोयो रसोरेंस यंत्र जब कंपन करता है तो उसका असर आपके तंत्रिका आवेगों पर पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप आपमें सिगरेट पीने कच् इच्छा कम हो जाती है।

Friday, June 4, 2010

अस्थमा को दावत देता है बर्गर!


यदि आप बर्गर खाने के शौकीन हैं तो संभल जाइए। एक नए शोध में पता चला है कि जो बच्चे जंक फूड पसंद करते हैं और सप्ताह में कम से कम तीन बर्गर खाते हैं, वे अस्थमा जैसी बीमारी को दावत दे रहे हैं।
वेबसाइट 'एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके' की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने इसके अध्ययन के लिए 20 देशों के 50,000 बच्चों को शामिल किया। शोध में पाया गया है बर्गर खाने वाले बच्चों को अस्थमा होने का खतरा अधिक होता है।
इस शोध में पाया गया कि ऐसे युवा जो फल, सब्जियों और मछली का सेवन करते हैं उनमें बीमारी से प्रभावित होने का खतरा कम रहता है।

Wednesday, June 2, 2010

दिलों को जीतिए मगर प्यार से


कहा जाता है कि प्यार से इन्सान दुनिया जीत सकता है और नफरत अपनों को भी दूर कर देती है। यह बात सुनने में ही नहीं बल्कि यथार्थ में भी अपना करिश्मा दिखाती है।
प्यार शब्द अपने आप में बहुत ही मीठा अहसास लिए होता है जो दोस्तों, दुश्मनों सभी को अच्छा लगता है। नफरत जहां अपनों को दुश्मन बना देती है वहीं प्यार में वह तासीर होती है जो दुश्मन को अपना बनाने का दम रखती है। यही वजह है कि प्यार से हर काम कराया जा सकता है और डांट फटकार, नफरत से केवल दूरियां बनती तथा बढ़ती हैं।
एक मनोविज्ञानी का कहती हैं कि बड़े तो बड़े, बच्चे तक प्यार की भाषा अच्छी तरह समझते हैं। अगर आप बच्चे को लगातार डांटते फटकारते रहेंगे तो बच्चे का आपके साथ जुड़ाव नहीं हो पाएगा, लेकिन बच्चे को भरपूर प्यार दे कर देखें, बच्चा आपके दिल को करीब आ जाएगा। यह बात खुद बच्चे की प्रतिक्रियाओं से ही साबित हो जाएगी।
एक पब्लिक स्कूल की प्राचार्य कहती हैं कि वैसे तो सभी शिक्षक अध्यापन के प्रति समर्पित होते हैं, लेकिन एक बात हमने महसूस किया है कि बच्चे उसी शिक्षक को अधिक पसंद करते हैं जो उन्हें प्यार से पढ़ाएं। ऐसे शिक्षक बच्चों को जो पढ़ाते हैं, उसे बच्चे आसानी से आत्मसात कर लेते हैं, लेकिन शिक्षक अगर डांट फटकार कर बच्चे को पढ़ाते हैं तो दोनों के बीच एक दूरी बन जाती है और बच्चे विषय को समझ नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि बच्चे उस विषय पर कम ध्यान देते हैं और उस पर उनकी पकड़ भी कमजोर होती जाती है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह सच है कि बच्चों को प्यार से समझाना आसान और उनके लिए ही बेहतर होता है। किसी विषय में बच्चे के कम अंक आने का कारण, उस विषय में बच्चे की दिलचस्पी कम होना है। उस विषय के शिक्षक का व्यवहार भी मायने रखता है। डांटने फटकारने वाला शिक्षक अगर बच्चे को पढ़ाएगा, तो बच्चे के मन में डर बैठ जाएगा। अगर बच्चे को कुछ समझ में न आए, तो वह शिक्षक की डांट के डर से पूछ भी नहीं पाएगा। नतीजा बच्चा उस विषय में कमजोर हो सकता है। इसीलिए बच्चों को प्यार से पढ़ाना चाहिए।
कैंसर जैसी बीमारी से जूझ कर मौत को परे कर चुके एक सेवानिवृत्त वन अधिकारी कहते हैं कि अस्पताल में बार-बार यह अहसास होता था कि कैंसर ने मेरे जीवन के दिन सीमित कर दिए हैं। ऐसे में जब डॉक्टर और नर्स प्यार से हौसला बंधाते थे तो बहुत अच्छा लगता था। आज मैं बिल्कुल ठीक हो चुका हूं, लेकिन उन डॉक्टरों और नर्सो की बहुत याद आती है। अगर वे रूखे ढंग से पेश आते, तो शायद मुझे समय से पहले ही मौत आ चुकी होती।
'लव कांकर्स डे' की शुरूआत कब और कैसे हुई इसकी जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन यह दिन प्यार से दिलों को जीतने का मूलमंत्र जरूर देता है।

न करें सुबह के नाश्ते को नजरअंदाज!


यदि आप एसिडिटी, मोटापे की शिकायत से जूझ रहे हैं और आपको किसी काम में ध्यान लगाने में परेशानी हो रही है तो शायद इसकी वजह आपका सुबह का नाश्ता न लेने की आदत है। ब्रेन फूड कहा जाने वाला सुबह का नाश्ता दिनभर का सबसे महत्वपूर्ण आहार है।
ज्यादातर शहरी लोग या तो अपनी व्यस्ततम जीवनशैली की वजह से नाश्ते को नजरअंदाज करते हैं या फिर वे सोचते हैं कि नाश्ता न लेने से छरहरी काया हासिल की जा सकती है। वजह जो भी हो, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे लोगों में मोटापे की शिकायत हो सकती है।
बत्रा अस्पताल की मुख्य आहार विशेषज्ञ अनीता जटाना ने को बताया कि ऐसा लगता है कि इन दिनों लोगों के पास सुबह के नाश्ते के लिए समय नहीं है। उनके पास पौष्टिक नाश्ता करने की स्वस्थ परंपरा से बचने के सभी कारण हैं।
वह इसे धारणा और जीवनशैली में बदलाव मानती हैं। उनका कहना है कि लोग कई वजहों से सुबह का नाश्ता नहीं करते। इनमें व्यस्तता, रात में देर से भोजन करना, खुद को छरहरा बनाने सहित कई वजहें शामिल हैं। इस तरह से वह अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी सुबह के नाश्ते से दूर रहते हैं।
आहार विशेषज्ञों के मुताबिक सुबह का नाश्ता बहुत जरूरी है। वे कहते हैं कि नाश्ता संतुलित होना चाहिए और इसमें कैल्शियम [दूध या दूध से वस्तुएं], प्रोटीन, रेशेदार पदार्थ [अंकुरित अनाज] और एंटीऑक्सीडेंट्स [सेब, स्ट्रॉबेरी, केला, संतरा] और विटामिन होने चाहिए।
मैक्स अस्पताल की मुख्य आहार विशेषज्ञ ऋतिका सामादार कहती हैं कि प्राय: ब्रेन फूड कहे जाने वाले सुबह के नाश्ते का संपूर्ण होना आवश्यक है और इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व होने चाहिए। शरीर की चयापचय प्रक्रिया के बेहतर होने के लिए सुबह पोषक नाश्ता लेना बहुत जरूरी है।
उनका कहना है कि रात के खाने और सुबह के नाश्ते के बीच 10 से 12 घंटे का अंतराल हो जाता है, जो कि बहुत लंबा समय है। ऐसे में यदि नाश्ता न किया जाए तो यह अंतराल और भी बढ़ जाता है और इस तरह से शरीर की चयापचय प्रक्रिया प्रभावित होती है।

Tuesday, June 1, 2010

टूटे हुए दिलों के डॉक्टर फिक्सइट


न कभी दिल टूटा, न ली चिकित्सा की शिक्षा लेकिन फिर भी हैं 'डॉक्टर फिक्सइट'। टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम करने वाले रंजन वर्धन को उनके चहेते 'डॉक्टर रीहेबिलिटेशन', 'डॉक्टर फील-गुड' और 'डॉक्टर फिक्सइट' कहकर ही पुकारते हैं।
रंजन वर्धन चंडीगढ़ में एक स्नात्कोत्तर कन्या महाविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। उन्हें टूटे हुए दिलों को जोड़ने के अद्वितीय क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल है, लेकिन ऐसा सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं है जिन्हें प्यार में निराशा हाथ लगती है।
वर्धन ने 1991 में चंडीगढ़ में 'ब्रोकन हार्ट रीहेबिलिटेशन सोसायटी' स्थापित की थी। अब वह एक-दो महीने में टूटे हुए दिलों के लिए समर्पित एक वेबसाइट शुरू करने जा रहे हैं।
वर्धन ने कहा कि 'ब्रोकन हार्ट' केवल प्यार में असफल होने वाले लोगों के लिए नहीं है। यह जिंदगी की ऐसी कोई भी असफलता हो सकती है जो लोगों का दिल तोड़ देती है। वास्तव में जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर हर किसी का दिल टूटता है और हमारी संस्था वहीं मदद करती है।
पेशे से समाजशास्त्री वर्धन ने अपने विचार अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए 2008 में एक किताब 'कोपिंग विद ब्रोकन हा‌र्ट्स-वल्‌र्ड्स फ‌र्स्ट सेल्फ-हेल्फ बुक फॉर ब्रोकन हा‌र्ट्स' लिखी थी।
वर्धन दावा करते हैं कि मैंने अपने आस-पास ऐसे कई लोगों को देखा जिन्हें या तो जिंदगी में कुछ पाने में असफलता मिली या प्रेम में उनके दिल टूटे, इसी से प्रेरित होकर मैंने 'ब्रोकन हार्ट सोसायटी' बनाई। इन लोगों के लिए किसी ने कुछ नहीं किया था। इसलिए मैंने इस दिशा में काम करना और परामर्श के द्वारा लोगों की मदद करना शुरू कर दिया। यह दुनिया में अपनी तरह की पहली शुरुआत है।
अब इस सोसायटी में 100 सदस्य हैं जो जिस किसी को भी आवश्यकता होती है उसे निजी तौर पर मिलकर या ई-मेल के जरिए परामर्श देते हैं। उन्होंने कहा कि कई लोग परामर्श के लिए हमसे संपर्क करते हैं।
टूटे हुए दिलों के लिए किए गए वर्धन के इस अनोखे प्रयास को 1999 में 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉ‌र्ड्स' में भी मान्यता मिली।
वर्धन जून में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पर एक शोध पत्र प्रस्तुत करने के लिए जा रहे हैं। उनका सपना है कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिले। वे कहते हैं कि मुझे अब तक नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है लेकिन नोबेल पुरस्कार हॉल में मेरी एक किताब का लोकार्पण हुआ है। वर्धन ने अब तक पांच किताबें और कई शोध पत्र लिखे हैं।
वर्धन के मुताबिक उन्होंने तीन मई 1977 को चंडीगढ़ में टूटे हुए दिलों के लिए दुनिया का पहला पुनर्वास शिविर आयोजित किया था। उन्होंने तीन मई को 'ब्रोकन हा‌र्ट्स डे' घोषित किया है।

अवसादरोधी दवाओं से गर्भपात का खतरा


दुनिया में अवसादरोधी दवाओं का इस्तेमाल बढ़ने के साथ गर्भपात का खतरा 68 प्रतिशत तक बढ़ गया है। एक नए अध्ययन में पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान अवसादरोधी दवाओं का बहुत इस्तेमाल होता है और 3.7 प्रतिशत महिलाएं गर्भावस्था के पहले तीन महीनों के दौरान कभी न कभी इनका उपयोग करती हैं।
इलाज बंद करने पर दोबारा अवसादग्रस्त होने की संभावना रहती है और इससे मां व बच्चे को खतरा हो सकता है। पूर्व में हुए ज्यादातर अध्ययनों में गर्भावस्था के दौरान अवसादरोधी दवाओं के इस्तेमाल और गर्भपात के बीच संबंध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। कई अध्ययनों में तो बिल्कुल उलटे परिणाम आए हैं।
मोंट्रियल विश्वविद्यालय [यूएम] के शोधकर्ताओं ने क्यूबेक की ऐसी ही 5,214 महिलाओं पर अध्ययन किया जिनका गर्भावस्था के 20वें सप्ताह में गर्भपात हुआ। शोधकर्ताओं ने इतनी ही संख्या में ऐसी महिलाओं का भी अध्ययन किया, जिनमें गर्भपात नहीं हुआ।
जिन महिलाओं में गर्भपात हुआ उनमें से 284 [पांच प्रतिशत] ने गर्भावस्था के दौरान अवसादरोधी दवाएं ली थीं।
'सिलेक्टिव सीरोटोनिन रीअपटेक इंहिबिटर्स' [एसएसआरआई] खासकर पैरोक्जीटीन और वीनलाफैक्जीन अवसादरोधी दवाओं की प्रतिदिन अधिक मात्रा लेने से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है।
अवसाद, चिंता, विकारों व कुछ व्यक्तित्व संबंधी विकारों के इलाज के लिए एसएसआरआई दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि चिकित्सकों को उनके पास पहले से अवसादरोधी दवाओं का इस्तेमाल कर रहीं या इनके इस्तेमाल के लिए सलाह लेने आने वाली महिलाओं को इन दवाओं के खतरों और फायदों के संबंध में स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए।

Tuesday, May 25, 2010

हृदयाघात व कैंसर का खतरा घटाती हैं चेरियां


चटख लाल रंग की खट्टी-मीठी रस भरी चेरी देख कर भला किसके मुंह में पानी नहीं आएगा। प्रकृति की देन यह खूबसूरत नन्हीं चेरी सूरत के साथ-साथ सीरत भी रखती हैं। इन्हें खाने से हृदयाघात और कैंसर होने का खतरा 25 फीसदी कम हो जाता है।
प्राकृतिक चिकित्सक के सी गर्ग ने बताया कि चेरी में मेलाटोनिन नामक तत्व पाया जाता है जो हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण होता है। चेरी में एन्थोसाइनिन नामक लाल पिगमेंट पाया जाता है। यह एन्टीआक्सीडेंट की तरह काम करता है। विटामिन सी और एन्थोसाइनिन से हमारे शरीर में पाया जाने वाला कैलोजन मजबूत होता है।
डा गर्ग ने बताया कि चेरियां हृदयघात और कैंसर का खतरा 50 फीसदी कम कर देती हैं। यह अर्थराइटिस, गठिया और सिरदर्द के उपचार में भी सहायक है और दर्द कम कर देती हैं। इसके अलावा जी मिचलाने और उल्टी की शिकायत इन नन्हें फलों से दूर हो जाती है। ब्रांकाइटिस, अस्थमा और हैजे के इलाज में भी चेरियां उपयोगी हैं।
ताजी चेरियां खाने का मजा ही कुछ और है। चेरी वाला कस्टर्ड या चेरी से सजी आइसक्रीम अथवा केक को कभी ध्यान से देखा है आपने। ऐसा लगता है मानों चेरियों से सज कप ये इठलाने लगते हैं।
आहार विशेषज्ञ शीला सहरावत ने बताया कि चेरी विटामिन सी और विटामिन के का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें थायमीन, राइबोफ्लैविन, विटामिन बी6 और पैंटोथेनिक अम्ल भी भरपूर पाया जाता है। इसमें नायसिन, फोलेट और विटामिन ए की संक्षिप्त मात्रा पाई जाती है।
सहरावत ने बताया कि पोटेशियम और मैगनीज जैसे खनिजों से भरपूर चेरी में कॉपर, आयरन, कैल्शियम और फास्फोरस भी संक्षिप्त मात्रा में पाए जाते हैं।
बेहद नन्हीं सी एक गुठली अपने अंदर समेटने वाली इस चेरी की खूबियों के चलते ही हर साल 26 मई को चेरी डेजर्ट डे मनाया जाता है। कुल 100 ग्राम चेरी में कैलोरी की मात्रा 63 होती है। रेशे की स्रोत चेरी में मुख्यत: पानी और कार्बोहाइड्रेट होता है और इसमें संतृप्त वसा [सैचुरेटेड फैट], कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा कम होती है।
चेरी से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य भी हैं। इंग्लैंड में बहुतायत में पाई जाने वाली चेरी अचानक वहां से नदारद हो गई। वहां के राजा हेनरी अष्टम ने फ्लैंडर्स में चेरी खाई और केंट में सिटिंगबर्न के समीप इसके बागान लगाने का आदेश दिया। तब एक बार फिर ब्रिटेन में चेरी की बहार आ गई।
आस्ट्रेलिया के न्यूसाउथ वेल्स का यंग शहर चेरी कैपिटल आफ आस्ट्रेलिया कहलाता है। यहां राष्ट्रीय चेरी महोत्सव हर साल आयोजित होता है।
अमेरिका के मिशीगन को चेरी कैपिटल आफ व‌र्ल्ड कहा जाता है। यहां भी राष्ट्रीय चेरी महोत्सव आयोजित किया जाता है जिसकी ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है।
कृषि वैज्ञानिक सी एस ठाकुर ने रायपुर [छत्तीसगढ़] से बताया कि चेरी के पौधों की बहुत देखभाल करनी पड़ती है। समय पर इनकी सिंचाई, उर्वरक, इनकी देखभाल, बारिश तथा ओलावृष्टि के कारण नुकसान की आशंका के चलते इसका उत्पादन बहुत खर्चीला होता है। इसके बावजूद चटख लाल चेरी की मांग में कमी नहीं आती।

Friday, May 21, 2010

अब कौमार्य भी पाइए कृत्रिम तौर पर


भारतीय समाज में शादी से पहले लड़कियों में कौमार्य अनिवार्य सी शर्त मानी जाती है, और शायद इसीलिए पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित महानगरों में अब ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं, जिनमें लड़कियां सुंदर नाक-नक्श की तरह ही कौमार्य भी कृत्रिम तौर पर हासिल कर रही हैं।
आम तौर पर शारीरिक संबंधों, खेल संबंधी शारीरिक गतिविधियों या कभी किसी चोट के कारण योनि के भीतर की हायमन झिल्ली फट जाती है, जिसे दुरूस्त कराने की प्रक्रिया हायमेनोप्लास्टी कहलाती है। इस सर्जरी का उपयोग अब कृत्रिम तौर पर कौमार्य पाने के लिए भी किया जा रहा है।
क्या हायमेनोप्लास्टी के बढ़ते मामलों के पीछे महानगरीय संस्कृति भी एक बड़ा कारण है, इस सवाल के जवाब में मुंबई के कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. अनुराग तिवारी ने कहा कि निश्चित तौर पर, महानगरों में आजकल शादी से पहले शारीरिक संबंध आम बात हो गई है और इसी के चलते कई लड़कियां, जिनकी जल्द शादी होने वाली है, कॉस्मेटिक सर्जन का रुख करती हैं, ताकि शादी के पहले के शारीरिक संबंधों के बारे में भावी पति को पता न चले।
हालांकि उन्होंने इस बात को भी स्वीकार किया कि लंबे समय तक खेलों और ऐसी ही अन्य शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी रहीं लड़कियां भी कई बार हायमेनोप्लास्टी कराती हैं।
डॉ. तिवारी ने कहा कि हायमेनोप्लास्टी मुख्य तौर पर योनि में कसाव लाने की प्रक्रिया है। पहले शारीरिक संबंध के बाद हायमन झिल्ली फट जाती है, जिसे दोबारा दुरूस्त करने के लिए हायमेनोप्लास्टी की जाती है। इसकी जरूरत कई बार उन लड़कियों को भी पड़ती है, जो खेलों या एथलेटिक्स संबंधी गतिविधियों में शामिल होती हैं, ताकि शादी के बाद किसी तरह की गलतफहमी न पैदा हो।
इस संबंध में दिल्ली के ख्यातिप्राप्त कास्मेटिक सर्जन डॉ. पी के तलवार ने बताया कि पिछले कुछ सालों में हायमेनोप्लास्टी के मामलों में इजाफा हुआ है और जल्द शादी करने जा रही लड़कियां यह सर्जरी कराने से नहीं हिचक रहीं।
डॉ. तलवार ने बताया कि निश्चित तौर पर लड़कियों और महिलाओं का हायमेनोप्लास्टी की ओर रुझान बढ़ा है। यह सर्जरी कराने वालों में हर वर्ग की महिलाएं शामिल हैं। कॉलेज जाने वाली लड़कियां, जिनकी शादी होने वाली है और कई तो शादीशुदा भी, इस सर्जरी से भावी जीवन का आनंद उठाने से नहीं हिचक रहीं।
डॉ. तलवार ने कहा कि शादीशुदा महिलाएं प्रसव के बाद भी कई बार इस सर्जरी का सहारा लेती हैं। कई महिलाएं ऐसी भी आती हैं, जिनकी शादी को 20 से भी ज्यादा वर्ष हो गए हैं और वे आगे भी वैवाहिक जीवन का भरपूर सुख उठाना चाहती हैं, इसलिए इस सर्जरी का विकल्प अपनाती हैं।
कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. मनीषा मनसुखानी उपचार की सुलभता को हायमेनोप्लास्टी के बढ़ते मामलों के पीछे का कारण मानती हैं। डॉ. मनीषा ने बताया कि देर से शादी और सामाजिक तौर पर खुलेपन के कारण भी लड़कियां हायमेनोप्लास्टी कराती हैं।
कॉस्मेटिक सर्जन ने बताया कि देर से शादी और ब्वॉयफ्रेंड्स की लंबी फेहरिस्त अब सोशल स्टेटस सिंबल बन गए हैं। ऐसे में लड़कियों को हायमेनोप्लास्टी के रूप में एक आसान विकल्प मिल जाता है। मेडिकल तकनीक दिनों-दिन आसान होती जा रही है और इसका फायदा हर वर्ग उठा रहा है।
डॉ. मनीषा के मुताबिक, इसके बाद भी कहा जा सकता है कि अब तक यह प्रक्रिया काफी हद तक उच्च या मध्यम वर्ग की महिलाओं के बीच ही सीमित है।

Thursday, May 20, 2010

अगर पति पत्नी से ज्यादा खुश हैं तो तलाक की आशंका


यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन महिलाओं को सावधान करने वाली है, यदि आपके पति आपसे ज्यादा खुश रहते हैं तो फिर आप पर तलाक की गाज गिर सकती है।
डीकिन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्रियों ने शोध के दौरान पाया कि यदि शादीशुदा जोडे़ के बीच खुशी का स्तर भिन्न है, खासकर यदि पति ज्यादा खुश होते हैं, तो तलाक की आशंका ज्यादा रहती है।
शोधकर्ताओं ने आस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन के आंकड़ों पर जब गौर फरमाया तो पाया कि पति-पत्नी के बीच खुशी के स्तर में जितनी अधिक भिन्नता थी, चाहे वह शादी का पहला ही साल क्यों न हो, तलाक का खतरा उतना ही अधिक था।
अध्ययन के दौरान पाया गया है कि हालांकि महिलाएं पुरुषों से अधिक खुश थीं, लेकिन जिन दंपतियों में पुरुष ज्यादा खुश थे वहां शादियां टूट गईं।
मुख्य शोधकर्ता अर्थशास्त्री डा. काहित गुवेन ने कहा कि तलाक के बाद पति और पत्नी के बीच खुशी का अंतर जरूर कम हुआ, लेकिन उनके बीच उन दंपतियों की तुलना में खुशी का अंतर ज्यादा ही रहा जहां दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हुए हैं।
उन्होंने कहा कि इसका मतलब उन्होंने शुरू में गलत निर्णय लिया और अलग होने के बाद उनमें खुशिया का अंतर बना रहा, गायब नहीं हुआ।
गुवेन ने कहा कि तलाक की खतरा आय और घर के कामकाज से भी जुड़ा होता है।

Wednesday, May 19, 2010

अब 10 मिनट में दूर होगी नपुंसकता


आने वाले दिनों में वैज्ञानिक एक ऐसा इनहेलर [सांस के जरिए शरीर में दवा प्रक्षेपित करने वाला यंत्र] विकसित करने में सफलता हासिल कर लेंगे, जो 10 मिनट में नपुंसकता दूर करने में सक्षम होगा। यह बात एक शोध में सामने आई है।
इन भविष्य के उपयोगी इनहेलर में 'एपोमॉर्फीन' नाम की एक पाउडर रूपी दवा भरी होगी, जो दिमाग में मौजूद तंत्रिकाओं को रासायनिक क्रिया के जरिए उत्तेजित करेगी। एपोमॉर्फीन का इजाद पार्किसन रोग के निवारण के लिए किया गया था, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि इसमें मनुष्य की यौन शक्ति बढ़ाने की भी क्षमता है।
नए इनहेलर को लेकर काम चल रहा है। इसका स्वरूप काफी हद तक दमे के इलाज के लिए उपयोग में लाए जाने वाले इनहेलर की तरह ही होगा।
अब तक नपुंसकता और कमजोर यौन शक्ति वाले लोग अपनी यौन संतुष्टि के लिए वियाग्रा और अन्य तरह की शक्तिवर्धक दवाओं का उपयोग करते आ रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इस दवाओं से छुटकारा मिल सकता है।

Saturday, May 15, 2010

महिलाओं के स्पर्श से बढ़ता है आत्मविश्वास


महिलाओं का स्पर्श अपनी निजी जिंदगी में दिक्कतों का सामना कर रहे पुरुषों के लिए बेहद कारगर है। एक नए शोध से पता चला है कि महिलाओं के स्पर्श मात्र से पुरुष खुद को अधिक सुरक्षित और जोखिम लेने में सक्षम पाते हैं।
वेबसाइट 'एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक शोध में बताया गया है कि अगर कोई पुरुष परेशानी से जूझ रहा हो या चिंता में डूबा हो तो ऐसे में महिलाओं के स्पर्श से चिंताओं में कमी आती है।
इस शोध में यहां तक कहा गया है कि अगर कोई पुरुष आर्थिक तंगी का सामना कर रहा हो और ऐसे में उसकी महिला साथी अपना हाथ उसकी पीठ पर रख दे तो उस व्यक्ति को बहुत सुकून महसूस होता है।
इस शोध में कुछ पुरुष और महिला स्वयंसेवियों को शामिल किया गया था। शोधकर्ताओं ने अलग अलग तरीकों से स्वागत करने का तरीका को चुना। कुछ महिलाओं और पुरुषों ने कंधे पर स्पर्श किया, कुछ ने हाथ मिलाया और कुछ ने दूरी बनाए रखी। इसके बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि महिलाओं का स्पर्श पुरुषों के लिए खास है।

Thursday, May 13, 2010

खुशहाल विवाहित जीवन दिल के लिए फायदेमंद


यदि आपका विवाहित जीवन खुशहाल है तो यह आपके दिल के लिए फायदेमंद हो सकता है। एक नए अध्ययन से पता चला है कि बढ़ती उम्र में प्यार करने वाली पत्नी का साथ हो तो पुरुषों में दिल के दौरे से होने वाली मौत का खतरा कम हो जाता है।

शीबा मेडीकल सेंटर के न्यूफील्ड कार्डिएक इंस्टीट्यूट के अध्ययनकर्ता यूरी गोल्डबार्ट का कहना है कि वैवाहिक खुशहाली और दिल के दौरे से होने वाली मृत्यु में संबंध है।

शोधकर्ताओं ने 1963 से 1997 तक 34 वर्षो तक एक अध्ययन किया था। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि अविवाहित पुरुषों और दुखी वैवाहिक जीवन वाले पुरुषों में खुशहाल विवाहित पुरुषों की अपेक्षा दिल के दौरे की संभावना 64 प्रतिशत ज्यादा होती है।

तेल अवीव विश्वविद्यालय ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें मध्यम आयु के 10,059 इजरायली पुरुषों में अध्ययन के आंकड़े इकट्ठे किए गए थे।साउथ कैरोलिना के चिकित्सा विश्वविद्यालय के डा. डेनियल लैकलैंड का कहना है कि साथी का सहयोगात्मक रवैया बीमारी से बचाने में कारगर हो सकता है। उन्होंने कहा कि पत्नी के सकारात्मक प्रभाव से चलते मरीज दवाएं लेता है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा भोजन चुनता है और उसे आपात स्थिति में चिकित्सा सुविधाएं भी तुरंत मुहैया हो जाती हैं।

Thursday, March 18, 2010

रहो खुश, दूसरों को भी रखो खुश


नई दिल्ली। दुनिया में खुशी से बढ़कर कोई खजाना नहीं है। जिसके पास खुशी है, वह दुनिया का सर्वाधिक संपन्न व्यक्ति माना जाता है, लेकिन लखपति, करोड़पति और अरबपति होने के बावजूद आज इंसान खुश नहीं है। वह कभी किसी को पछाड़ने की कोशिश में दुखी रहता है तो कभी किसी से पिछड़ जाने पर दुखी रहता है। ऐसे में 'एक्ट हैप्पी डे' इंसान को खुश रहने और दूसरों को भी खुशी से रहने देने की नसीहत देता है।

भारत में 'एक्ट हैप्पी डे' से शायद ही कोई परिचित हो, लेकिन पश्चिम के कई देशों में यह दिन काफी लोकप्रिय हो चला है। हर साल 19 मार्च को मनाया जाने वाला यह दिन अमेरिका में तो किसी उत्सव से कम नहीं होता और वहां के लोग इसे मनाने के लिए 'हैप्पी क्लब्स' में जाते हैं।

ग्रीटिंग कार्ड कंपनियां भी इस मौके को खूब भुनाती हैं और वे खुशी से संबंधित तरह-तरह के संदेश देने के लिए खूबसूरत बधाई कार्ड बाजार में उतारती हैं।

मनोचिकित्सक समीर पारिख का कहना है कि अगर इंसान खुश रहना सीख जाए तो उसकी जिन्दगी सफल हो सकती है। उनका कहना है कि जिसका मन खुशी से भरा होगा, उसका तन भी हमेशा स्वस्थ रहेगा।

डेल कार्नेगी ने भी अपनी पुस्तक 'चिंता छोड़ो, सुख से जीओ' में इंसान को खुश रहने का संदेश दिया है और उन्होंने खुशी को सबसे बड़ी संपत्ति बताया है।

कार्नेगी ने लिखा है कि चिंता छोड़ने से खुशी और खुश रहने से सुख मिलता है, इसलिए मनुष्य को हमेशा खुश रहना चाहिए। अपनी किताब में उन्होंने खुश रहने और सुख से जीने के कई नुस्खे भी सुझाए हैं।

समाजशास्त्री स्वर्ण सहगल का मानना है आज भागमभाग और प्रतिस्पद्र्धा की जिन्दगी में मनुष्य की खुशी खोती जा रही है। कभी उसे पारिवारिक परिस्थितियां खुश नहीं रहने देतीं तो कभी उसे करियर संबंधी परेशानियां दुखी किए रहती हैं। ऐसे में यदि खुशी के नाम पर कोई खास दिवस मनाया जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

अमेरिका और कनाडा में 'एक्ट हैप्पी डे' का सर्वाधिक क्रेज देखने को मिलता है जहां लोग अपने संबंधियों को न सिर्फ फोन या ई-मेल से बधाई देते हैं, बल्कि वे मिलने के लिए उनके घर भी जाते हैं।इस अवसर पर लोग मिठाई भेंट करने के साथ ही एक-दूसरे की खुशी के लिए कामना भी करते हैं।

अनूठी सेक्स लाइफ है पाइप फिश की


पेरिस। नन्हीं सी, चमकने वाली पाइप फिश की सेक्स लाइफ अन्य मछलियों की तुलना में बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें मादा नहीं बल्कि नर मछली गर्भधारण करती है।दिलचस्प बात यह है कि भविष्य में प्रजनन के लिए संसाधन बचाए रखने की खातिर आवश्यकता के अनुसार, नर पाइप फिश कुछ भ्रूणों का गर्भपात भी कर देती है।

पाइप फिश मत्स्य समूह की दो मछलियों सी हार्स और सी ड्रैगन से मिलती-जुलती है। नर पाइप फिश के शरीर में एक गुहा होती है। मादा पाइप फिश नर पाइप फिश के साथ संसर्ग के दौरान उसके शरीर की इस गुहा में अपने अंडे छोड़ देती है। अंडे इस गुहा में विकसित होते हैं। गर्भकाल 12 से 14 दिन का होता है।इस पारदर्शी गुहा में नर पाइप फिश पांच से लेकर 40 बच्चे रख सकती है। वह उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी करती है।

नए अध्ययन में पाया गया है कि मादा पाइप फिश नर पाइप फिश की गुहा के आधार पर उसकी ओर आकर्षित होती है। वहीं दूसरी ओर नर पाइप फिश बड़े आकार की मादा पाइप फिश को संसर्ग के लिए चुनते हैं।अगर संसर्ग छोटे आकार की पाइप फिश से होता है तो नर पाइप फिश कुछ भ्रूण का गर्भपात कर देता है ताकि भविष्य में प्रजनन के लिए संसाधन बने रहें।

Wednesday, February 24, 2010

होली और स्वास्थ्य के लिए भांग!


होली नजदीक आ रही है और इसके साथ ही भांग की ठंडाई और भांग के पकोड़ों का स्वाद भी जल्दी ही मिलने वाला है। बहुत कम लोग ही भांग के स्वास्थ्य के लिए फायदों को जानते हैं। चिकित्सा भाषा में कैनाबिस सटाइवा कही जाने वाली भांग का आयुर्वेदिक उपचार में बहुत इस्तेमाल होता है।

एक पंचकर्म विशेषज्ञ गीतांजली अरोड़ा कहती हैं कि रोग के लक्ष्णों और कारणों के आधार पर आयुर्वेद में भांग का अलग-अलग इस्तेमाल होता है।

कई प्रकार के रोगों जैसे दर्द, मतली और उल्टी के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। मधुमेह के कारण वजन में होने वाली कमी और तंत्रिकातंत्र संबंधी रोगों के इलाज में भी इसका इस्तेमाल होता है। यदि सही मात्रा में लिया जाए तो इससे बुखार और पेचिश के इलाज, तुरंत पाचन और भूख बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

गठिया, अवसाद और चिंता के इलाज के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है, जबकि त्वचा रोगों के उपचार में भी यह लाभदायक है।

आयुर्वेद विशेषज्ञ विपिन शर्मा ने बताया कि कई लोग त्वचा के रूखी और खुरदुरी होने की शिकायत लेकर आते हैं और यह पाया गया है कि भांग की ताजा पत्तियों का लेप लगाने से त्वचा ठीक हो जाती है।देश के कई हिस्सों में लोग भोजन से पहले भांग खाते हैं। इन लोगों का मानना है कि इससे न केवल भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, बल्कि इससे पाचन भी बेहतर होता है।

भारत में 1000 ईसा पूर्व भांग का एक नशीले पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होता था और अथर्ववेद में इसे चिंता दूर करने वाली एक जड़ी-बूटी बताया गया है।

Wednesday, February 17, 2010

दो भाषाएं कैसे सीखते हैं नवजात!


मां की गर्भावस्था के दौरान गर्भ में दो भाषाएं सुनने वाले शिशु जन्म के बाद दो भाषाएं सीखने की राह पर होते हैं।केवल एक भाषा बोलने वाली माताओं के शिशुओं की अपेक्षा द्विभाषी माताओं [जो गर्भावस्था के दौरान दो भाषाएं बोलती हैं] के शिशुओं की भाषाओं के प्रति अलग वरीयता होती है।

'युनीवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया' [यूबीसी] की मनोवैज्ञानिक क्रिस्टा बीयर्स-हीनलीन, जैनेट एफ। रेकर और फ्रांस के 'ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट' की ट्रैसी ब‌र्न्स नवजातों में भाषा वरीयता की जांच करना चाहती थीं।

शोधकर्ताओं ने इसके लिए नवजातों के दो समूहों पर शोध किया। इनमें से एक समूह में सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चे थे। दूसरे समूह में तागालोग [फीलीपींस में बोली जाने वाली एक भाषा] और अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चे थे। पहले समूह के बच्चों की माताएं गर्भावस्था के दौरान केवल अंग्रेजी भाषा बोलती थीं, जबकि दूसरे समूह के बच्चों की माताएं ताबालोग और अंग्रेजी बोलती थीं।

नवजातों की भाषा वरीयता को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने 'उच्च आयाम की चूसने की वरीयता प्रक्रिया' का इस्तेमाल किया।शोध में पता चला कि सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चों में तागालोग की अपेक्षा अंग्रेजी के प्रति रुचि थी। जबकि दोनों भाषाएं बोलने वाली माताओं के नवजात बच्चों में दोनों भाषाओं के प्रति एक जैसी वरीयता थी।

परिणामों से स्पष्ट होता है कि दो भाषाओं के संपर्क में रहने से नवजातों की भाषा के प्रति वरीयता प्रभावित होती है और द्विभाषी माताओं के बच्चों को दोनों भाषाएं सुनने और सीखने के लिए तैयार किया जा सकता है।