Saturday, May 15, 2010

महिलाओं के स्पर्श से बढ़ता है आत्मविश्वास


महिलाओं का स्पर्श अपनी निजी जिंदगी में दिक्कतों का सामना कर रहे पुरुषों के लिए बेहद कारगर है। एक नए शोध से पता चला है कि महिलाओं के स्पर्श मात्र से पुरुष खुद को अधिक सुरक्षित और जोखिम लेने में सक्षम पाते हैं।
वेबसाइट 'एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक शोध में बताया गया है कि अगर कोई पुरुष परेशानी से जूझ रहा हो या चिंता में डूबा हो तो ऐसे में महिलाओं के स्पर्श से चिंताओं में कमी आती है।
इस शोध में यहां तक कहा गया है कि अगर कोई पुरुष आर्थिक तंगी का सामना कर रहा हो और ऐसे में उसकी महिला साथी अपना हाथ उसकी पीठ पर रख दे तो उस व्यक्ति को बहुत सुकून महसूस होता है।
इस शोध में कुछ पुरुष और महिला स्वयंसेवियों को शामिल किया गया था। शोधकर्ताओं ने अलग अलग तरीकों से स्वागत करने का तरीका को चुना। कुछ महिलाओं और पुरुषों ने कंधे पर स्पर्श किया, कुछ ने हाथ मिलाया और कुछ ने दूरी बनाए रखी। इसके बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि महिलाओं का स्पर्श पुरुषों के लिए खास है।

Thursday, May 13, 2010

खुशहाल विवाहित जीवन दिल के लिए फायदेमंद


यदि आपका विवाहित जीवन खुशहाल है तो यह आपके दिल के लिए फायदेमंद हो सकता है। एक नए अध्ययन से पता चला है कि बढ़ती उम्र में प्यार करने वाली पत्नी का साथ हो तो पुरुषों में दिल के दौरे से होने वाली मौत का खतरा कम हो जाता है।

शीबा मेडीकल सेंटर के न्यूफील्ड कार्डिएक इंस्टीट्यूट के अध्ययनकर्ता यूरी गोल्डबार्ट का कहना है कि वैवाहिक खुशहाली और दिल के दौरे से होने वाली मृत्यु में संबंध है।

शोधकर्ताओं ने 1963 से 1997 तक 34 वर्षो तक एक अध्ययन किया था। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि अविवाहित पुरुषों और दुखी वैवाहिक जीवन वाले पुरुषों में खुशहाल विवाहित पुरुषों की अपेक्षा दिल के दौरे की संभावना 64 प्रतिशत ज्यादा होती है।

तेल अवीव विश्वविद्यालय ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें मध्यम आयु के 10,059 इजरायली पुरुषों में अध्ययन के आंकड़े इकट्ठे किए गए थे।साउथ कैरोलिना के चिकित्सा विश्वविद्यालय के डा. डेनियल लैकलैंड का कहना है कि साथी का सहयोगात्मक रवैया बीमारी से बचाने में कारगर हो सकता है। उन्होंने कहा कि पत्नी के सकारात्मक प्रभाव से चलते मरीज दवाएं लेता है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा भोजन चुनता है और उसे आपात स्थिति में चिकित्सा सुविधाएं भी तुरंत मुहैया हो जाती हैं।

Thursday, March 18, 2010

रहो खुश, दूसरों को भी रखो खुश


नई दिल्ली। दुनिया में खुशी से बढ़कर कोई खजाना नहीं है। जिसके पास खुशी है, वह दुनिया का सर्वाधिक संपन्न व्यक्ति माना जाता है, लेकिन लखपति, करोड़पति और अरबपति होने के बावजूद आज इंसान खुश नहीं है। वह कभी किसी को पछाड़ने की कोशिश में दुखी रहता है तो कभी किसी से पिछड़ जाने पर दुखी रहता है। ऐसे में 'एक्ट हैप्पी डे' इंसान को खुश रहने और दूसरों को भी खुशी से रहने देने की नसीहत देता है।

भारत में 'एक्ट हैप्पी डे' से शायद ही कोई परिचित हो, लेकिन पश्चिम के कई देशों में यह दिन काफी लोकप्रिय हो चला है। हर साल 19 मार्च को मनाया जाने वाला यह दिन अमेरिका में तो किसी उत्सव से कम नहीं होता और वहां के लोग इसे मनाने के लिए 'हैप्पी क्लब्स' में जाते हैं।

ग्रीटिंग कार्ड कंपनियां भी इस मौके को खूब भुनाती हैं और वे खुशी से संबंधित तरह-तरह के संदेश देने के लिए खूबसूरत बधाई कार्ड बाजार में उतारती हैं।

मनोचिकित्सक समीर पारिख का कहना है कि अगर इंसान खुश रहना सीख जाए तो उसकी जिन्दगी सफल हो सकती है। उनका कहना है कि जिसका मन खुशी से भरा होगा, उसका तन भी हमेशा स्वस्थ रहेगा।

डेल कार्नेगी ने भी अपनी पुस्तक 'चिंता छोड़ो, सुख से जीओ' में इंसान को खुश रहने का संदेश दिया है और उन्होंने खुशी को सबसे बड़ी संपत्ति बताया है।

कार्नेगी ने लिखा है कि चिंता छोड़ने से खुशी और खुश रहने से सुख मिलता है, इसलिए मनुष्य को हमेशा खुश रहना चाहिए। अपनी किताब में उन्होंने खुश रहने और सुख से जीने के कई नुस्खे भी सुझाए हैं।

समाजशास्त्री स्वर्ण सहगल का मानना है आज भागमभाग और प्रतिस्पद्र्धा की जिन्दगी में मनुष्य की खुशी खोती जा रही है। कभी उसे पारिवारिक परिस्थितियां खुश नहीं रहने देतीं तो कभी उसे करियर संबंधी परेशानियां दुखी किए रहती हैं। ऐसे में यदि खुशी के नाम पर कोई खास दिवस मनाया जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

अमेरिका और कनाडा में 'एक्ट हैप्पी डे' का सर्वाधिक क्रेज देखने को मिलता है जहां लोग अपने संबंधियों को न सिर्फ फोन या ई-मेल से बधाई देते हैं, बल्कि वे मिलने के लिए उनके घर भी जाते हैं।इस अवसर पर लोग मिठाई भेंट करने के साथ ही एक-दूसरे की खुशी के लिए कामना भी करते हैं।

अनूठी सेक्स लाइफ है पाइप फिश की


पेरिस। नन्हीं सी, चमकने वाली पाइप फिश की सेक्स लाइफ अन्य मछलियों की तुलना में बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें मादा नहीं बल्कि नर मछली गर्भधारण करती है।दिलचस्प बात यह है कि भविष्य में प्रजनन के लिए संसाधन बचाए रखने की खातिर आवश्यकता के अनुसार, नर पाइप फिश कुछ भ्रूणों का गर्भपात भी कर देती है।

पाइप फिश मत्स्य समूह की दो मछलियों सी हार्स और सी ड्रैगन से मिलती-जुलती है। नर पाइप फिश के शरीर में एक गुहा होती है। मादा पाइप फिश नर पाइप फिश के साथ संसर्ग के दौरान उसके शरीर की इस गुहा में अपने अंडे छोड़ देती है। अंडे इस गुहा में विकसित होते हैं। गर्भकाल 12 से 14 दिन का होता है।इस पारदर्शी गुहा में नर पाइप फिश पांच से लेकर 40 बच्चे रख सकती है। वह उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी करती है।

नए अध्ययन में पाया गया है कि मादा पाइप फिश नर पाइप फिश की गुहा के आधार पर उसकी ओर आकर्षित होती है। वहीं दूसरी ओर नर पाइप फिश बड़े आकार की मादा पाइप फिश को संसर्ग के लिए चुनते हैं।अगर संसर्ग छोटे आकार की पाइप फिश से होता है तो नर पाइप फिश कुछ भ्रूण का गर्भपात कर देता है ताकि भविष्य में प्रजनन के लिए संसाधन बने रहें।

Wednesday, February 24, 2010

होली और स्वास्थ्य के लिए भांग!


होली नजदीक आ रही है और इसके साथ ही भांग की ठंडाई और भांग के पकोड़ों का स्वाद भी जल्दी ही मिलने वाला है। बहुत कम लोग ही भांग के स्वास्थ्य के लिए फायदों को जानते हैं। चिकित्सा भाषा में कैनाबिस सटाइवा कही जाने वाली भांग का आयुर्वेदिक उपचार में बहुत इस्तेमाल होता है।

एक पंचकर्म विशेषज्ञ गीतांजली अरोड़ा कहती हैं कि रोग के लक्ष्णों और कारणों के आधार पर आयुर्वेद में भांग का अलग-अलग इस्तेमाल होता है।

कई प्रकार के रोगों जैसे दर्द, मतली और उल्टी के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। मधुमेह के कारण वजन में होने वाली कमी और तंत्रिकातंत्र संबंधी रोगों के इलाज में भी इसका इस्तेमाल होता है। यदि सही मात्रा में लिया जाए तो इससे बुखार और पेचिश के इलाज, तुरंत पाचन और भूख बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

गठिया, अवसाद और चिंता के इलाज के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है, जबकि त्वचा रोगों के उपचार में भी यह लाभदायक है।

आयुर्वेद विशेषज्ञ विपिन शर्मा ने बताया कि कई लोग त्वचा के रूखी और खुरदुरी होने की शिकायत लेकर आते हैं और यह पाया गया है कि भांग की ताजा पत्तियों का लेप लगाने से त्वचा ठीक हो जाती है।देश के कई हिस्सों में लोग भोजन से पहले भांग खाते हैं। इन लोगों का मानना है कि इससे न केवल भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, बल्कि इससे पाचन भी बेहतर होता है।

भारत में 1000 ईसा पूर्व भांग का एक नशीले पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होता था और अथर्ववेद में इसे चिंता दूर करने वाली एक जड़ी-बूटी बताया गया है।

Wednesday, February 17, 2010

दो भाषाएं कैसे सीखते हैं नवजात!


मां की गर्भावस्था के दौरान गर्भ में दो भाषाएं सुनने वाले शिशु जन्म के बाद दो भाषाएं सीखने की राह पर होते हैं।केवल एक भाषा बोलने वाली माताओं के शिशुओं की अपेक्षा द्विभाषी माताओं [जो गर्भावस्था के दौरान दो भाषाएं बोलती हैं] के शिशुओं की भाषाओं के प्रति अलग वरीयता होती है।

'युनीवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया' [यूबीसी] की मनोवैज्ञानिक क्रिस्टा बीयर्स-हीनलीन, जैनेट एफ। रेकर और फ्रांस के 'ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट' की ट्रैसी ब‌र्न्स नवजातों में भाषा वरीयता की जांच करना चाहती थीं।

शोधकर्ताओं ने इसके लिए नवजातों के दो समूहों पर शोध किया। इनमें से एक समूह में सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चे थे। दूसरे समूह में तागालोग [फीलीपींस में बोली जाने वाली एक भाषा] और अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चे थे। पहले समूह के बच्चों की माताएं गर्भावस्था के दौरान केवल अंग्रेजी भाषा बोलती थीं, जबकि दूसरे समूह के बच्चों की माताएं ताबालोग और अंग्रेजी बोलती थीं।

नवजातों की भाषा वरीयता को जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने 'उच्च आयाम की चूसने की वरीयता प्रक्रिया' का इस्तेमाल किया।शोध में पता चला कि सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोलने वाली माताओं के बच्चों में तागालोग की अपेक्षा अंग्रेजी के प्रति रुचि थी। जबकि दोनों भाषाएं बोलने वाली माताओं के नवजात बच्चों में दोनों भाषाओं के प्रति एक जैसी वरीयता थी।

परिणामों से स्पष्ट होता है कि दो भाषाओं के संपर्क में रहने से नवजातों की भाषा के प्रति वरीयता प्रभावित होती है और द्विभाषी माताओं के बच्चों को दोनों भाषाएं सुनने और सीखने के लिए तैयार किया जा सकता है।

Tuesday, February 16, 2010

40 के बाद चकल्लस औरतों के लिए एक ख्वाब


कहावत मशहूर है कि जिंदगी की शुरूआत ही 40 साल के बाद होती है लेकिन ढेर सारी ब्रिटिश औरतों के लिए 40 के बाद की चकल्लस बस एक ख्वाब है और वे सेक्स से बेनियाज जिंदगी बिताती हैं। एक नवीनतम सर्वेक्षण ने यह चौंका देने वाले तथ्य पेश किए हैं कि ब्रिटेन में करीब 28 प्रतिशत औरतों ने 40 साल की इस सरहद तक पहुंचने से बहुत पहले ही सेक्स जीवन से रूख मोड़ लिया था।

स्कॉटलैंड की स्थिति और भी अलग थी। वहां 38 फीसदी 35 साल की उम्र पार करने के बाद सक्रिय यौन संबंधों से नाता तोड़ कर किताबों में मौज मस्ती खोजने की कोशिश में लग जाती हैं।

मामला बस इतना ही नहीं हैं। 'यूगोव' सर्वेक्षण की रिपोर्ट हमें बताती है कि जो औरतें सेक्स संबंधों के सागर में डुबकियां लगाना जारी रखती हैं, उन्हें भी दस तरह की दिक्कतों और अड़चनों से जूझना होता है। ज्यादातर मामलों में बाल बच्चे रंग में भंग डाल देते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक एक बच्चे वाली केवल 12 फीसदी महिलाएं ही सेक्स का लुत्फ उठाने में कामयाब हो पाती हैं, और वह भी तब जब उन्हें इसका कोई मौका मिल पाता है।

सर्वेक्षण में यह रोचक तथ्य भी उभर कर आया कि बिना बाल-बच्चे वाली 41 फीसदी औरतें सेक्स संबंधों में हमेशा लुत्फ की बुलंदियों को छूती हैं। सर्वेक्षण का कहना है कि सेक्स के प्रति रुचि, लालसा में गिरावट के लिए रोजी-रोटी के लिए व्यस्तता जिम्मेदार है। औरतें आर्थिक जीवन बेहतर बनाने की अपनी कोशिश में सेक्स जीवन कुर्बान कर देती हैं। सर्वेक्षण में बताया गया है कि औरतें जितना कम काम करती हैं, रात में बिस्तर में उतना ही ज्यादा आनंद से सराबोर होती हैं।

डेली एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार पार्ट टाइम काम करने वाली दो तिहाई से ज्यादा औरतें बिस्तर पर यौन आनंद की बुलंदियों को छूती हैं, लेकिन जब मामला पूर्णकालिक काम करने वाली औरतों की आती है तो इस आंकड़े में जबरदस्त गिरावट आती है। महज 50 फीसदी औरतें ही सेक्स संबंधों में इस मुकाम तक पहुंच पाती हैं।

इस सर्वेक्षण में महिला मन के अनेक कोनों को टटोला गया। लिहाजा, सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने यह भी रहस्योद्घाटन किया कि 26 फीसदी औरतें इस बात को ले कर परेशान रहती हैं कि रजोनिवृत्ति के बाद सेक्स की उनकी चाहत खत्म हो जाएगी।

सर्वेक्षण ने यह रोचक तथ्य भी उजागर किया कि 26 फीसदी औरतों को यह डर सालता रहता है कि उनके जीवन में आ रहे इस 'बदलाव' का खराब असर उनकी याददाश्त पर पड़ेगा।

मनोवैज्ञानिक एवं 'हैविंग इट ऑल' की लेखिका प्रोफेसर पावला निकल्सन ने महिला मन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी जिंदगी में दबाव बढ़ गए हैं और यह अच्छा होगा अगर महिलाएं सेक्स की जगह बेहतर प्रस्तुति से ज्यादा लुत्फ हासिल करें।

पावला ने कहा कि सेक्स [संबंधों] में गिरावट एक हद तक इस वजह से हो सकती है कि महिलाएं अब ज्यादा शक्तिशाली पदों पर हैं। काम और बाल बच्चों के चलते समय कम हो गया है। बहरहाल, उन्होंने सलाह दी कि महिलाओं को इसका लुत्फ उठाने के लिए कुछ रास्ते निकालने चाहिए।

पावला ने कहा कि अगर कुछ वक्त बचता है तो जोड़ों को महीने में एक बार रूमानी शाम का लुत्फ उठाना चाहिए। अगर उनके बीच रिश्ते काम करते हैं तो यह ज्यादा अहम नहीं है कि उनके बीच सेक्स की कोई समस्या है। नजदीकी ज्यादा अहम है।