Saturday, August 14, 2010

चीजों को याद रखने के लिए देखे सपने...


जब भी लोग बिस्तर पर जाते हैं एक दूसरे को 'शुभरात्रि' और 'अच्छे सपने देखिए' कहना नहीं भूलते हैं। भले ही ऐसा वो शिष्टाचारवश या हमारे मंगल कामना के लिए कहते हों, लेकिन हाल के एक अध्ययन से यह बात सिद्ध हुई है कि सपने देखने से चीजों को याद रखने में सहायता मिलती है।
डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि सपने देखने से दिमाग में याद्दाश्त के संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। वास्तव में जब हम सोते हैं तो उस समय हमारी आंखे गतिशील रहती हैं और हम सपना देखते हैं। यह प्रक्रिया एक तरह से याद्दाश्त के साथ जुड़ी होती है।
इस शोध को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की नींद विशेषज्ञ डॉक्टर सारा मेडनिक ने किया है। उन्होंने अपने इस शोध के तहत लोगों के एक समूह की स्मरण शक्ति से संबंधित एक साधारणा सी जांच परीक्षा ली। यह पाया गया कि जिन लोगों को आंखों की गति के साथ झपकी लेने दी गई थी उनकी स्मरण शक्ति और इस जांच के परिणाम में 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई।
इस बारे में डॉ. मेडनिक ने कहा कि हम रोजाना जितने तरह की सूचनाएं ग्रहण करते हैं उनको स्मरण शक्ति के द्वारा संजोकर रख लेने और बाद में उपयोग करने के लिए आंखों की गतिशीलता के साथ सोना महत्वपूर्ण है।

Friday, August 13, 2010

सावन में गूंजती है भोजपुरी लोकगीतों की गूंज


यूं तो सावन के मनभावन महीने में पूरा उत्तर भारत ही बूंदों की अठखेलियों और बादलों की आंख-मिचौली के बीच हर तरफ बिखरी हरियाली का आनंद लेता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्वाचल क्षेत्र में इस दौरान भोजपुरी लोकगीतों की गूंज के साथ सावन की एक अलग छटा दिखाई देती है।
पूर्वाचल में इस पूरे माह को एक त्यौहार के रुप में मनाया जाता है और जहां खेत, खलिहान और बाग-बगीचों में हरियाली छाई रहती है। वहीं, सभी के मन में एक अजीब सा उत्साह हिलोरे लेता हुआ गांव-गांव, गली-गली भोजपुरी लोकगीतों को गाया जाता है।
सावन महीने में पड़ने वाली नाग-पंचमी के दिन तो एक खास उत्साह पूरे पूर्वाचल पर छाया रहता है और खासकर युवतियों और नवविवाहिता लड़कियां झुंड बनाकर पेड़ों की डालों पर पड़े झूलों के ऊंचे हुलारे लेती हुई अपनी सखियों के संग भोजपुरी लोकगीत गाती हैं।
सावन के झूले के साथ गाए जाने वाले गीतों में संयोग और वियोग रस के गीतों की भरमार रहती है और साथ ही राधा-कृष्ण के प्रसंगों का जिक्र भी इन गीतों में भरपूर पाया जाता है।
इस माह में सुहागन अपने प्रिय को अपने आसपास ही चाहती है और उसे सावन का महीना अपने प्रिय के बिना च्च्छा नहीं लगता..''
हमके ना भावे हो सावन बिना सजनवा हो ननदी।''
...तो कहीं झूलों पर झूलती सजी संवरी युवतियां..,
राधा संग में झूला झूले बनवारी हे गोइया.. और
घेरि-घेरि आई घटा कारी-कारी सखिया..
के गीत कानों में अमृत रस घोलते है।
आज की आधुनिकतावादी, भागदौड़ और शहरी संस्कृति में ये प्राचीन परंपराएं कम जरुर हो रही है, परन्तु आज भी पूर्वाचल के गांवों में इसका विशेष महत्व है।
नागपंचमी के दिन यह एक सांस्कृतिक त्यौहार की तरह मनाया जाता है और झूला झूलने का क्रम पूरे एक महीने चलता है तथा गांवों में महिलाएं रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर श्रृंगार करके झूला झूलते समय कजरी गाती है।
महिलाओं का झुंड बगैर किसी तैयारी के रात भर नाटक नौटंकी भी करती हैं और जब वह एक सुर में गीत गाती है तो पूरे माहौल में एक अजीब सी मस्ती रात के सन्नाटे को तोड़ती हुई हर किसी के मन में गुदगुदी पैदा कर देती है।

Wednesday, August 11, 2010

जूते पॉलिश कर भाई के इलाज के पैसे जुटा रही हैं बहनें


गंभीर बीमारी से पीडि़त अपने भाई के इलाज के लिए उत्तर प्रदेश के कानपुर की दो बहनें जो कर रही हैं, वह दुनिया की हर बहन के लिए एक नजीर है।
सृष्टि [15] और मुस्कान [9] नाम की दो बहनें अविकासी रक्ताल्पता [अप्लास्टिक एनीमिया] से पीडि़त अपने भाई अनज [14] के इलाज का पैसा जुटाने के लिए पिछले कुछ समय से शहर के विभिन्न इलाकों में लोगों के जूतों में पॉलिश करने का काम कर रही हैं।
कानपुर शहर के खलासी लाइन इलाके में रहने वाली इन बहनों के पिता पेशे से एक स्कूटर मैकनिक हैं, जो बेटे के इलाज के लिए अपना सब कुछ गिरवी रख चुके हैं।
पिता मनीष बहल [43] ने कहा कि 'चिकित्सकों का कहना है कि मेरे बेटे का अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण [बोन मैरो ट्रांसप्लांट] करना पड़ेगा, जिसमें करीब 20 लाख रुपये का खर्च आएगा। मेरी बेटियों को यह बात पता है कि उनके पिता अकेले इलाज के लिए इतने सारे पैसे नहीं जुटा सकते हैं। इसलिए वे कठिन मेहनत से पैसे इकट्ठा करके अपने पिता का सहारा देने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि वैसे तो मुझे पता है कि मेरी बेटियां जूते पॉलिश करके कभी भी 20 लाख रुपये नहीं जुटा सकती हैं, लेकिन उनका जज्बा और कठिन परिश्रम मुझमें सकारात्मक सोच का संचार करता हैं। मुझे ऐसी बेटियों का पिता होने पर गर्व महसूस होता है।
अविकासी रक्ताल्पता एक असाध्य रक्त विकार होता है, जिसमें अस्थि मज्जा पर्याप्त नई रक्त कणिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता है। यह रक्त विकार, गंभीर होने पर जानलेवा हो जाता है।
दोनों बहनें हाथ में 'मेरे भाई को बचाओ' लिखी तख्ती लेकर शहर के अलग-अलग मुहल्लों, बाजारों, बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन जैसे भीड़-भाड़ वाले जगहों पर जाकर लोगों से जूते-चप्पल पॉलिश कराने का अनुरोध करती हैं।
कक्षा पांच में पढ़ने वाली मासूम मुस्कान कहती हैं कि मैं अपने भाई को जल्द से जल्द घर ले जाना चाहती हूं। भाई के इलाज के पैसे जुटाने के लिए मै कठिन परिश्रम करूंगी। मेहनत से इकट्ठा किये पैसे हम चिकित्सकों के देंगे जो हमारे भाई का इलाज करेंगे।
हर दिन सृष्टि और मुस्कान स्कूल से वापस लौटने के बाद अपने काम पर निकल पड़ती हैं।
बहल के मुताबिक दोनों बेटियों ने उन्हें बताया कि कई लोग उनके गले में तख्ती देखकर उनके भाई के बारे में पूछते हैं। हमारे परिवार के हालात सुनकर कुछ लोग 50 से 100 रुपये की मदद कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि हम मददगार लोगों की भावनाओं का दिल से सम्मान करते हैं। वैसे ये बड़ा सत्य है कि हमें अनुज को बचाने के लिए एक बड़ी धनराशि की जरूरत है।
फिलहाल कानपुर के आर एल रोहतगी अस्पताल में अनुज का उपचार चल रहा है, जहां उसकी हालत बिगड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।
बहल कहते हैं कि असल में जन्म के दो महीने बाद ही अनुज अविकासी रक्ताल्पता से ग्रसित हो गया था। किसी तरह पूर्वजों द्वारा छोड़ा गया कीमती सामान और गहने गिरवी रखकर मैं उसका उपचार करवा रहा हूं।
उन्होंने कहा कि अपने बेटे के उपचार के लिए मैंने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बाहर के कई चिकित्सकों से परामर्श किया। बाद में मुंबई के एक चिकित्सक की देखरेख में अनुज की हालत बेहतर होने लगी। चिकित्सक ने कहा कि अनुज का हर छह माह में रक्त आधान [ब्लड ट्रांसफ्यूजन] करवाना पड़ेगा। साथ ही उसे कुछ दवाइयों की भी आवश्यकता होगी।
उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे 1998 के बाद अनुज के सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया, लेकिन जुलाई 2009 में एक बार फिर उसकी हालत बिगड़ गई।
अपने बेटे के उपचार पर करीब 15 लाख रुपये खर्च कर चुके बहल को चिकित्सकों ने बताया कि अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से ही उनके बेटे की जान बच सकती है।
फिलहाल अनुज का इलाज कर रहे आर एल रोहतगी अस्पताल के चिकित्सक ए के पांडे ने कहा कि मैंने अनुज की जांच रिपोर्ट का अध्ययन किया है। उसे अतिविशिष्ट चिकित्सीय सुविधाओं वाले अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता है, जहां पर उसका अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण हो सके।

Saturday, August 7, 2010

माइका की चादरों के बीच हुई जीवन की उत्पत्ति


धरती पर जीवन की शुरुआत कब हुई? इस लाख टके के अर्से पुराने सवाल का एक नया जवाब सामने आया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ सम्भवत: खनिज माइका की चादरों के बीच हुआ।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के एक दल ने 'लाइफ बिटवीन द शीट्स' माइका परिकल्पना तैयार की है। इसके बारे में 'जर्नल ऑफ थेयोरेटिकल बायोलॉजी' के आगामी अंक में विस्तार से जिक्र किया गया है।
'लाइफ बेटवीन द शीट्स' मिका परिकल्पना के मुताबिक मिका की परतों के बीच आमतौर पर बनने वाले संरचित कक्षों में सम्भवत: ऐसे अणु संरक्षित हुए होंगे जिनसे आगे चलकर कोशिकाओं का निर्माण हुआ।
संरचित कक्षों में सही भौतिक और रासायनिक वातावरण मिलने से फले-फूले अणु बाद में कोशिकाओं में तब्दील हुए।
अध्ययन दल की मुख्य वैज्ञानिक हेलेन हंसमा ने कहा कि चूंकि माइका की परतें जीवित कोशिकाओं तथा प्रोटीन, न्यूक्लियक अम्ल, कार्बोहाइड्रेट्स और वसा जैसे बड़े जैविक अणुओं के जीवन के लिए अनुकूल होती हैं इसलिए माइका परिकल्पना भी अन्य मशहूर परिकल्पनाओं की इस राय से सहमत है कि जीवन का आरम्भ राइबोन्यूक्लिक एसिड [आरएनए], वसायुक्त वैसिलेस और आदिम चयापचय के रूप में हुआ था।
उन्होंने कहा कि हो सकता है कि माइका में सभी प्राचीन चयापचयों, वसा वैसिलेस और आरएनए की दुनिया समाई रही हो।

Thursday, August 5, 2010

अब राह चलेत पढि़ए कामसूत्र का पाठ


यदि आप कामसूत्र का पाठ पढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अब इस किताब को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस पुस्तक को एक 'ऑडियो बुक' का रूप दिया जा चुका है। इससे आप कहीं भी और कभी भी इसे आसानी से सुन सकते हैं।
वेबसाइट 'एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके' के मुताबिक ब्रिटेनवासी अब इस पुरानी पुस्तक को अपने घर में अथवा बस या रेलगाड़ी में सफर करते समय भी सुन सकते हैं।
इस ऑडियो का प्रकाशन करने वाले 'ब्यूटीफुल बुक्स' को उम्मीद है कि उसकी इस पहल से नई पीढ़ी के लोग 1,600 साल पहले मित्रता, शादी और संबंधों के बारे में लिखी गई पुस्तक के बारे में आसानी से जान सकते हैं।
ऑडियो में इस पुस्तक की व्याख्या करने वाली ब्रिटेन की टेलीविजन स्टार तान्या फ्रैंक ने कहा कि जब मुझे कामसूत्र को पढ़ने के लिए कहा गया तो मैं काफी परेशान और उत्साहित भी थी।
फ्रैंक ने कहा कि जब हमने इसे पूरा कर लिया तो काफी राहत महसूस हुई।
ब्यूटीफुल बुक्स के प्रबंध निदेशक सिमोन पैथरिक कहते हैं कि अब इस किताब को पढ़ने के लिए शर्मिदा होने की आवश्यकता नहीं हैं। आप इसे अपने एमपी-3 प्लेयर पर आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं।
ऑडियो कामसूत्र की कीमत 14.2 डॉलर है और इसे 'ब्यूटीफुल-बुक्स डॉट को डॉट यूके' से डाउनलोड भी किया जा सकता है।

Wednesday, August 4, 2010

चीनी मांझा से पुश्तैनी कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का सवाल


वैश्वीकरण के दौर में चीन का सामान भारत के बाजारों पर काबिज होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों से रंग-बिरंगी पतंग उड़ाने में काम आने वाले बरेली के मशहूर मांझे पर भी अब चीनी मांझे की मार पड़नी शुरु हो गई है, जिससे पुश्तैनी कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का सवाल उत्पन्न हो गया है।
मांझा और पतंग कारोबार में देश भर के तकरीबन तीन लाख कारीगर काम करते हैं और पिछले दो सालों से कारखानों में रसायनों एवं धातुओं के अंश मिश्रित चीनी मांझे ने हाथ से निर्मित मांझा कारोबार पर असर डालना शुरू कर दिया है।
हाथ से बने मांझे की तुलना में चौथाई कीमत पर उपलब्ध चाइनीज मैटेलिक मांझे के कारण बरेली सहित देश भर के मांझा कारीगरों को बेकारी और भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया है। हालांकि, मांझा कारोबार बचाने के लिए सामाजिक संगठन, श्रमिक संगठन, बुद्धिजीवियों ने मुहिम शुरू कर दी है।
देश भर में बरेली का हस्तनिर्मित मांझा सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यही कारण है कि भारत सहित विदेश में भी बरेली के मांझे की अपनी अलग पहचान है।
हस्तनिर्मित मांझा रोजगार बचाओ आंदोलन के जनक एवं लोकाधिकार संस्था के राज्य समन्वयक हरीश पटेल ने बताया कि संस्था द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि चीनी [मैटेलिक] मांझे का कारोबार यूं ही बढ़ता रहा तो स्वदेशी हस्तनिर्मित मांझे का कारोबार समाप्त हो जाएगा और अगले दो वर्षो में दो लाख माझा कारीगर बेरोजगार हो जाएंगे।
पटेल ने बताया कि पूरे देश में लगभग 125 करोड़ रुपये के मांझे का कारोबार होता है, जिसमें अकेले बरेली में 60 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार होता है।
मांझा कारीगरों के बीच काम करने वाले पूर्व मेयर एवं रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व गर्वनर डा. आई. एस. तोमर ने कहा कि चीनी मांझे में घातक रसायनों का प्रयोग किया जाता है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार, बरेली शहर में मांझा कारोबार से जुड़े 30 हजार परिवार आर्थिक विपन्नता की मार झेल रहे है। मांझा कारीगरों को किसी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं मिल रही है। इस व्यवसाय को कुटीर उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया है।
मांझा कारीगर इनाम अली कहते हैं कि हस्तनिर्मित मांझे में सुहागा, चावल, प्राकृतिक रंग लोवान, छाल, बोरिक पाउडर जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने बताया कि मांझा कारीगरों की मांझा निर्माण की शैली परम्परागत है और इनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है और न ही ऋण प्राप्ति के स्रोत हैं।
उन्होंने बताया कि मांझा कारोबारियों के प्रति सरकार का उपेक्षित और उदासीन रवैया पहले से था और अब वैश्विक बाजार की आड़ में चीनी मांझे के भारतीय बाजार में आने से मांझा कारोबारियों की कमर टूट गई है। चीनी मांझा हस्तनिर्मित स्वदेशी मांझे की अपेक्षा एक चौथाई कीमत पर उपलब्ध हो जाता है।
विभिन्न संगठनों द्वारा चीनी मांझे पर रोक की मांग की जा रही है क्योंकि यह जब कम दाम पर विकल्प उपलब्ध कराता है तो कोई अधिक दाम क्यों देगा? चीनी मांझे के कारण हस्तनिर्मित मांझा कारीगरों की आय निम्न स्तर पर पहुंच गई है, जिसके कारण मांझा कारीगर तंगहाली में अपना जीवनयापन कर रहे हैं और परिणाम स्वरुप पलायन को मजबूर है।
मांझा कारोबारियों की स्थिति के मद्देनजर केंद्र एवं राज्य सरकार को बेहतर कदम उठाने चाहिए और मांझा कारोबारियों की आर्थिक मदद के लिए आगे आना चाहिए। मांझा कारोबार को कुटीर उद्योग का दर्जा प्रदानकर उन्हें सरकारी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
पटेल बताते हैं कि बरेली के हस्तनिर्मित मांझे को महाराष्ट्र में सर्वाधिक पसन्द किया जाता है और नासिक, नागपुर तथा मुंबई में बरेली निर्मित मांझे के शौकीनों की खासी संख्या है। इसके साथ ही देश के अन्य भागों दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात में भी बरेली का मांझा लोकप्रिय है।
बरेली का हस्तनिर्मित मांझा मुंबई के रास्ते इण्टर नेशनल स्टैण्डर्ड पैकिंग के साथ फ्रांस, कोरिया, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और पाकिस्तान तक जाता है जहां विभिन्न मौकों पर पतंगबाजी का लुभावना खेल खेला जाता है।
विभिन्न संगठनों की मांग है कि सरकार चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाए और स्वदेशी मांझा कारीगरों के हितों की रक्षा करें। वरना बरेली के 30 हजार तथा देश के तीन लाख मांझा कारीगरों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और देश की प्रमुख धरोहर अतीत के गर्भ में समा जाएगी।

Tuesday, August 3, 2010

महिलाओं को लाल रंग में ज्यादा आकर्षक लगते हैं पुरुष


यदि आप महिलाओं को आकर्षित और उन्हें अपने करीब लाना चाहते हैं तो लाल रंग का चुनाव कीजिए। महिलाओं को वे पुरुष ज्यादा आकर्षक लगते हैं जो लाल रंग के वस्त्र पहनते हैं, इसी तरह महिलाओं को पुरुषों की वे तस्वीरें ज्यादा सुहाती हैं जिनमें लाल रंग की चौखट या फ्रेम हो।
लाल रंग को महिलाओं के प्रति पुरुषों का आकर्षण बढ़ाने वाला और खेल में अच्छे प्रदर्शन को बढ़ावा देने वाला रंग माना जाता है। समाचार पत्र 'टेलीग्राफ' में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में पहली बार यह सामने आया है कि महिलाओं को भी पुरुषों पर लाल रंग ही अच्छा लगता है।
अमेरिका के रोशेस्टर विश्वविद्यालय और जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एंड्रयू इलियट कहते हैं कि आमतौर पर लाल रंग को केवल महिलाओं के लिए आकर्षक रंग माना जाता है।
उन्होंने कहा कि उनका अध्ययन बताता है कि लाल और आकर्षण के बीच का संबंध पुरुषों को लुभाता है।
'जर्नल फॉर एक्सपेरीमेंटल साइकोलॉजी' में प्रकाशित हुए अध्ययन के लिए 25 पुरुषों और 32 महिलाओं को एक आदमी की श्वेत-श्याम तस्वीरें दिखाई गईं। इनमें से एक तस्वीर लाल पृष्ठभूमि में ली गई थी और दूसरी सफेद पृष्ठभूमि में। इसके बाद अध्ययन में शामिल लोगों से इन तस्वीरों के प्रति आकर्षण से संबंधित तीन प्रश्न पूछे गए थे।
महिलाओं ने आदमी की लाल रंग की फ्रेम से घिरी तस्वीर को ज्यादा आकर्षक बताया, जबकि पुरुषों के साथ ऐसा कुछ नहीं था।
एक अन्य प्रयोग में महिलाओं को एक आदमी की लाल और हरी पोशाक की तस्वीरें दिखाई गईं। इसमें भी महिलाओं को लाल पोशाक वाली तस्वीर ज्यादा आकर्षक लगी।
वैसे अलग-अलग संस्कृतियों में लाल रंग का मतलब अलग-अलग है, लेकिन सभी देशों की महिलाओं को लाल रंग के परिधानों में पुरुष ज्यादा आकर्षक लगते हैं।