Thursday, February 11, 2010

बुजुर्गो के लिए 'बेशर्मी' से बढ़कर कुछ नहीं है वैलेंटाइन डे


वैलेंटाइन डे को चाहे प्रेम का दिन कहा जाए या फिर कुछ और, लेकिन बुजुर्ग इसे 'बेशर्मी' का दिन मानते हैं। उनका कहना है कि देश की नौजवान पीढ़ी इससे ''बर्बाद'' हो रही है, लेकिन युवा इससे बिल्कुल सहमत नहीं हैं और उनका मानना है कि समय के साथ बदलना चाहिए।
दिल्ली के एक सरकारी स्कूल से बतौर प्रधानाचार्य सेवानिवृत्त 70 वर्षीय रमेश कुमार का कहना है कि वैलेंटाइन डे का नाम भी 'बेहूदा' है और यह 'बेशर्मी' का दिन है।
उन्होंने कहा कि प्यार का मतलब सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन करना नहीं है और न ही इसका मतलब यह है कि इस दिन घरवालों को धोखा देकर घर से किसी बहाने बाहर निकल जाओ और फिर मौज करो। कुमार का कहना है कि आजकल के लड़के-लड़की प्यार का मतलब नहीं समझते और वे इसके नाम पर सिर्फ अश्लीलता को बढ़ावा देते हैं।
बहरहाल, किरोड़ीमल कॉलेज के छात्र सुकेश जैन इससे सहमत नहीं हैं। वह कहते हैं कि जो कल था वह आज नहीं है, जो आज है वह कल नहीं होगा। समय के साथ बहुत कुछ बदल रहा है। इसे स्वीकार करना चाहिए। पहले के समय में और आज के समय में अंतर है। वैलेंटाइन डे को 'बेशर्मी' से जोड़ना बिल्कुल गलत है। युवाओं को भी उनकी मर्जी से जीने की आजादी है।
दिल्ली जल बोर्ड की सेवानिवृत्त कर्मचारी जानकी देवी का कहना है कि उनके दिनों में वैलेंटाइन डे जैसा कुछ नहीं था, लेकिन आजकल अखबारों और टेलीविजन ने इस दिन के बारे में दिखा-दिखा कच्र बच्चों को ''बर्बाद'' कर दिया है। राष्ट्रीय राजधानी स्थित एक फ्रिज कंपनी में काम करने वाले गंगेश राय कहते हैं कि प्यार के नाम पर नौजवान पीढ़ी भटकती जा रही है। उसे भले बुरे का ज्ञान नहीं रहा।
उन्होंने कहा कि वे रोजाना पलवल और दिल्ली के बीच लोकल ट्रेन से सफर करते हैं और इस दौरान ट्रेन की खिड़की से उन्हें निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास स्थित इंद्रप्रस्थ पार्क में लड़के-लड़कियां सरेआम अश्लील हरकतें करते दिखते हैं। यह बहुत ही शर्मनाक दृश्य होता है। ऐसे में यदि आपके साथ बहन-बेटी भी सवार हो तो बहुत बुरा लगता है।
उन्होंने कहा कि यह आए रोज की बात है। ऐसी चीजों पर रोक लगनी चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या हिन्दू संगठन वैलेंटाइन डे का विरोध कर सही काम करते हैं, गंगेश ने कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए और न ही किसी के साथ जोर जबर्दस्ती होनी चाहिए। हां सरकार को इस बारे में कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए कि पार्को जैसे सार्वजनिक स्थलों पर लोग प्यार के नाम पर आपत्तिजनक हरकतें न करें। उधर सुकेश कहते हैं कि कुछ लोग आपत्तिनजक हरकतें करें तो सभी को इस दायरे में लाना सही नहीं है। आपत्तिजनक हरकतें करने वाले वैलेंटाइन डे की राह क्यों देखेंगे, वह तो साल में कभी भी, कहीं भी ऐसा कर सकते हैं। वैलेंटाइन डे एक प्यार के खूबसूरत अहसास से जुड़ा हुआ है और इस अहसास को बनाए रखना चाहिए।
सेवानिवृत्त सूबेदार हनुमंत प्रसाद का कहना है कि प्यार में कोई बुराई नहीं, लेकिन वैलेंटाइन डे के नाम पर आज जो कुछ हो रहा है, वह सही नहीं है। इससे सामाजिक मान-मार्यादाएं कलंकित हो रही हैं।

2 comments:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

चाहे अभी हमने बुजुर्गियत में कदम नहीं रखा है लेकिन हमारा भी यही मानना है कि ये "डे-कल्चर" बहुत जल्द हमारे पारिवारिक,सामाजिक जीवन एवं सांस्कृ्ति की लुटिया डुबोने वाला है!
यदि अब भी न जागे तो फिर शायद आने वाले कल को सोचने का भी अवसर न मिले........

Udan Tashtari said...

अतिश्योक्ति हो तो बेशर्मी के दायरे में ही आयेगा अन्यथा क्या बुराई नजर आती है.