Wednesday, June 2, 2010

दिलों को जीतिए मगर प्यार से


कहा जाता है कि प्यार से इन्सान दुनिया जीत सकता है और नफरत अपनों को भी दूर कर देती है। यह बात सुनने में ही नहीं बल्कि यथार्थ में भी अपना करिश्मा दिखाती है।
प्यार शब्द अपने आप में बहुत ही मीठा अहसास लिए होता है जो दोस्तों, दुश्मनों सभी को अच्छा लगता है। नफरत जहां अपनों को दुश्मन बना देती है वहीं प्यार में वह तासीर होती है जो दुश्मन को अपना बनाने का दम रखती है। यही वजह है कि प्यार से हर काम कराया जा सकता है और डांट फटकार, नफरत से केवल दूरियां बनती तथा बढ़ती हैं।
एक मनोविज्ञानी का कहती हैं कि बड़े तो बड़े, बच्चे तक प्यार की भाषा अच्छी तरह समझते हैं। अगर आप बच्चे को लगातार डांटते फटकारते रहेंगे तो बच्चे का आपके साथ जुड़ाव नहीं हो पाएगा, लेकिन बच्चे को भरपूर प्यार दे कर देखें, बच्चा आपके दिल को करीब आ जाएगा। यह बात खुद बच्चे की प्रतिक्रियाओं से ही साबित हो जाएगी।
एक पब्लिक स्कूल की प्राचार्य कहती हैं कि वैसे तो सभी शिक्षक अध्यापन के प्रति समर्पित होते हैं, लेकिन एक बात हमने महसूस किया है कि बच्चे उसी शिक्षक को अधिक पसंद करते हैं जो उन्हें प्यार से पढ़ाएं। ऐसे शिक्षक बच्चों को जो पढ़ाते हैं, उसे बच्चे आसानी से आत्मसात कर लेते हैं, लेकिन शिक्षक अगर डांट फटकार कर बच्चे को पढ़ाते हैं तो दोनों के बीच एक दूरी बन जाती है और बच्चे विषय को समझ नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि बच्चे उस विषय पर कम ध्यान देते हैं और उस पर उनकी पकड़ भी कमजोर होती जाती है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह सच है कि बच्चों को प्यार से समझाना आसान और उनके लिए ही बेहतर होता है। किसी विषय में बच्चे के कम अंक आने का कारण, उस विषय में बच्चे की दिलचस्पी कम होना है। उस विषय के शिक्षक का व्यवहार भी मायने रखता है। डांटने फटकारने वाला शिक्षक अगर बच्चे को पढ़ाएगा, तो बच्चे के मन में डर बैठ जाएगा। अगर बच्चे को कुछ समझ में न आए, तो वह शिक्षक की डांट के डर से पूछ भी नहीं पाएगा। नतीजा बच्चा उस विषय में कमजोर हो सकता है। इसीलिए बच्चों को प्यार से पढ़ाना चाहिए।
कैंसर जैसी बीमारी से जूझ कर मौत को परे कर चुके एक सेवानिवृत्त वन अधिकारी कहते हैं कि अस्पताल में बार-बार यह अहसास होता था कि कैंसर ने मेरे जीवन के दिन सीमित कर दिए हैं। ऐसे में जब डॉक्टर और नर्स प्यार से हौसला बंधाते थे तो बहुत अच्छा लगता था। आज मैं बिल्कुल ठीक हो चुका हूं, लेकिन उन डॉक्टरों और नर्सो की बहुत याद आती है। अगर वे रूखे ढंग से पेश आते, तो शायद मुझे समय से पहले ही मौत आ चुकी होती।
'लव कांकर्स डे' की शुरूआत कब और कैसे हुई इसकी जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन यह दिन प्यार से दिलों को जीतने का मूलमंत्र जरूर देता है।

1 comment:

आचार्य जी said...

क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !